रिटायर्ड डीजीपी विक्रम सिंह
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रिटायर्ड डीजीपी विक्रम सिंह का कहना है कि यह प्रयोग पूरी तरह सफल होगा, इस पर संशय है। अगर इसे लागू ही करना था तो पहले पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर पूरब, पश्चिम व मध्य यूपी के एक-एक जिले में दो-तीन महीने के लिए करके देख लेना चाहिए था। इससे न सिर्फ कुछ नई चीजें सामने आतीं बल्कि कमियों को दूर करने का मौका भी होता। पूरे प्रदेश में 414 कोतवाली पर एक साथ इसे लागू करना जोखिम भरा, मगर साहसिक निर्णय है। इससे आउटपुट पर नकारात्मक फर्क पड़ेगा क्योंकि किसी भी इंस्पेक्टर की ख्वाहिश होती है कि वह थाने का प्रभारी बने। ऐसे में अगर उसे एडिशनल इंस्पेक्टर कानून-व्यवस्था, क्राइम या अपराध की जिम्मेदारी मिलती है तो वह अपने सीनियर की टांग खींचने या उसे फेल करने की अधिक कोशिश करेगा न कि आउटपुट देने की।
रिटायर्ड डीजीपी अरविंद कुमार जैन
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रिटायर्ड डीजीपी अरविंद कुमार जैन का कहना है कि फेल होने के डर से कोई प्रयोग न करें, ऐसा नहीं होना चाहिए। हालांकि इसमें नीचे के पुलिस कर्मियों में आदेशों के पालन को लेकर विवाद सामने आ सकता है। ऐसे में थानों पर कहीं टकराव जैसे हालात न पैदा हो जाएं। नई व्यवस्था से क्षेत्राधिकारियों और अपर पुलिस अधीक्षक की जिम्मेदारी अधिक बढ़ जाएगी। उन्हें इनके कामकाज की बारीकी से मॉनिटरिंग करनी होगी।
नई व्यवस्था में अतिरिक्त प्रभारी निरीक्षक को अधीनस्थ स्टाफ दिए जाने की व्यवस्था नहीं है। उन्हें पूर्व में चली आ रही व्यवस्था के अनुसार ही काम लेना होगा। ऐसे में अधीनस्थ अधिकारी कितना सहयोग करते हैं, इस पूरे प्रयोग की सफलता इसी पर निर्भर करेगी।