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यूपी में मनरेगा ने लिखी भ्रष्टाचार की 'महागाथा'

Mon, 02 Mar 2015 01:20 AM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
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मनरेगा को कांग्रेस की विफलताओं का स्मारक बताने वाली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टिप्पणी कम से कम यूपी के लिहाज से तो फिट ही बैठती है। दस साल से लागू यह योजना सूबे के गरीबों की दशा-दिशा तो नहीं बदल पाई, उल्टा भ्रष्टाचार, लूट-खसोट का पर्याय जरूर बन गई।
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सहयोगियों की सियासत व सत्तामोह में उलझी रही कांग्रेस इस भ्रष्टाचार को रोकने का कोई ठोस उपाय नहीं कर पाई। अब मोदी मनरेगा के भ्रष्टाचार वाले चेहरे को लेकर ही कांग्रेस पर करारा प्रहार कर रहे हैं।

यूपीए-1 सरकार ने वर्ष 2005 में गरीबों को मांग के आधार पर काम देने के लिए मनरेगा योजना की शुरुआत की थी। गेमचेंजर के तौर पर पेश की गई इस योजना का ही कमाल माना गया कि सूबे में चौथे नंबर की पार्टी कांग्रेस 2009 के लोकसभा चुनाव में 9 से 21 सीटों पर पहुंच गई थी।
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हालांकि दस साल से लागू इस योजना की प्रदेश में चर्चा उसकी खूबियों को लेकर शायद ही कहीं होती हो। योजना के नाम पर की गई लूटपाट और भ्रष्टाचार ही सुर्खियां बनते आए हैं।

आज पूरे प्रदेश में मनरेगा के काम सीबीआई जांच के दायरे में हैं। न सिर्फ ब्लॉक व विकास से जुड़े निचले स्तर के अधिकारियों और पंचायत प्रतिनिधियों की पोल खुल रही है, बल्कि कई आईएएस-पीसीएस अधिकारी व जनप्रतिनिधि जेल भी जा चुके हैं।

सपा सरकार ने भी किया जांच का विरोध

यूपीए शासनकाल के ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने मनरेगा में भ्रष्टाचार का हवाला देते हुए बलरामपुर, गोंडा, महोबा, सोनभद्र, संतकबीरनगर, मिर्जापुर और कुशीनगर में 2007 से 2010 के बीच हुए कामों की सीबीआई जांच का ऐलान किया था।

उन्होंने सीबीआई जांच की सिफारिश के लिए कई बार तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती को, लेकिन उन्होंने सहमति नहीं दी। तब विपक्ष में बैठी सपा ने सीबीआई जांच न कराने के लिए बसपा पर तगड़ा हमला बोला था।

सत्ता बदली तो रमेश ने सपा सरकार से भी सीबीआई जांच के लिए कई बार आग्रह किया, पर बसपा राज के भ्रष्टाचार की जांच का जनादेश लेकर आई सपा सरकार सीबीआई जांच की मुखालफत करने सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई। बाद में कोर्ट के आदेश पर पूरे प्रदेश में मनरेगा की सीबीआई जांच का आदेश हुआ।

कैसी-कैसी लूट
- गोंडा में 2007-08 में एक करोड़ रुपये के खिलौने, 1.09 करोड़ के टेंट, 50 लाख रुपये की पानी की टंकियां, दो करोड़ के गैंती-फावड़े, तसला की खरीद में गड़बड़ियां मिलीं।

- महोबा में 2008-09 में लखनऊ की फर्म से 51 लाख रुपये के टेंट खरीदे गए और 50 लाख का भुगतान भी हो गया। जांच में न सामान मिला और न फर्म को खोजा जा सका।

- बलरामपुर  में वर्ष 2007-08 के दौरान डेढ़ लाख रुपये के कैलेंडर, डायरी, 80 लाख के टेंट और सात लाख के फर्स्ट एड बॉक्स खरीद लिए गए। छह लाख रुपये क ी पानी की टंकी खरीदी गई।

30 लाख की फर्नीचर की खरीद

- कुशीनगर में कई पंचायतों ने राजेश नाम के व्यक्ति को 50 लाख रुपये तक के चेक दे दिए। वहां 20 लाख के फर्स्ट एड बॉक्स, 75 लाख के फावड़े, 25 लाख की पानी की टंकियों की फर्जी खरीद का मामला भी सामने आया। 30 लाख रुपये की फर्नीचर की खरीद भी दिखाई गई।

- मिर्जापुर: बिना मानकों को पूरा किए मनरेगा फंड से सामान खरीदे गए। जांच में लगभग चार करोड़ रुपये के दुरुपयोग का मामला सामने आया।

- सोनभद्र में 2009-10 में मनरेगा के नाम पर 250 करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए। एक ही तालाब कई-कई बार खुदवाया गया। राजनीतिक हस्तियों व आईएएस अधिकारियों के रिश्तेदारों के नाम से बनी फर्जी फर्मों से 150 करोड़ रुपये की फर्जी खरीद सामने आई।

- संतकबीर नगर: यहां के ब्लॉक सांथा में राजनीतिक संरक्षण पाए बाहुबलियों ने हर काम पर कब्जा किया। तत्कालीन स्थानीय विधायक के गठजोड़ से सरकारी धन की लूट की बात सामने आई।

इन घोटालों ने तो रिकॉर्ड ही तोड़ दिए

- कानपुर देहात में ऐसे लोगों को बीज खरीदकर बांट दिए जिनके पास खेत तक नहीं थे। 80 रुपये प्रति किलोग्राम कीमत वाले धनिया के बीज 584 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से खरीदे गए।

- सुल्तानपुर, मथुरा एवं चित्रकूट में नियम विरुद्ध उत्तर प्रदेश सहकारी निर्माण एवं विकास संघ लि. को करोड़ों रुपये के काम आवंटित कर दिए गए।

- चित्रकूट में लगभग 50 लाख रुपये से 700 डिजिटल कैमरों की खरीद।
- सीतापुर में तालाबों के निर्माण में लाखों का घपला।
- औरैया में 56 लाख 21 हजार 560 रुपये से ट्री गार्डों की खरीद।

- बांदा में दो करोड़ रुपये की मेज-कुर्सी की खरीद।
-सिद्धार्थनगर में 1210 ग्राम पंचायतों में 15 लाख रुपये से शिकायत पेटिकाओं की खरीद।

-महराजगंज में स्वयंसेवी संस्था को 50 लाख रुपये का प्रचार-प्रसार कार्य आवंटित।
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कई अफसर गए जेल, 42 हुए निलंबित

मनरेगा की सीबीआई जांच में बड़ों पर शिकंजा कसना शुरू हो गया है। अब तक कई अधिकारी जेल जा चुके हैं। इनमें बलरामपुर के पूर्व डीएम व आईएएस अधिकारी सच्चिदानंद दुबे, कुशीनगर के पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष प्रदीप जायसवाल, तत्कालीन जिला पंचायत सदस्य विजय अग्रवाल व तत्कालीन अपर मुख्य अधिकारी प्रदीप कुमार शामिल हैं।

बसपा सरकार ने मनरेगा में भ्रष्टाचार की सीबीआई जांच तो नहीं कराई, लेकिन प्रदेश स्तर पर हुई जांच के मद्देनजर कई मुख्य विकास अधिकारियों सहित 42 को निलंबित कर दिया था।

इसके अलावा 69 अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई, 51 अधिकारियों व कर्मचारियों को प्रतिकूल प्रविष्टि व 38 ग्राम प्रधानों व 30 ग्राम विकास अधिकारियों पर कार्रवाई की घोषणा की थी।

संसद में ये कहा था प्रधानमंत्री मोदी ने-
मैं मनरेगा स्कीम को कभी बंद नहीं करूंगा। मैं ऐसी गलती कभी नहीं कर सकता, क्योंकि यह कांग्रेस सरकार की विफलताओं का स्मारक है।...लेकिन हम इसे नागरिकों के लिए कल्याणकारी बनाने के लिए जरूरी सुधार करेंगे। मनरेगा को गाजे-बाजे के साथ चालू रखा जाएगा।
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