चुनाव पर नजर और बड़े-बड़े विभागों की बड़े-बड़े अफसरों को जिम्मेदारी। बेहतर काम से सरकार की छवि बनाने के जिम्मेदार यही अफसर अब सरकार की किरकिरी के सबब बनते जा रहे हैं। वित्त, सचिवालय प्रशासन और औद्योगिक विकास के साथ बेसिक शिक्षा विभाग भी इसी कतार में शामिल हो गया है।
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जानकार बताते हैं कि शासन के कई अफसर जो चाहते हैं, ‘सम्यक विचार’ का तर्क देकर सरकार से करा लेते हैं। लेकिन, जब न्याय की कसौटी पर उसकी समीक्षा की नौबत आती है तो अक्सर पता चलता है कि फैसले बेहद कमजोर तर्क और व्यावाहरिक पक्ष पर ध्यान दिए बिना किए गए। कई बार संवेदनशील नजरिया भी नहीं अपनाया गया। यह चलन बढ़ता जा रहा है।
शासन के एक वरिष्ठ अफसर कहते हैं कि विभागीय मंत्रियों के कामकाज में ठीक से रुचि न लेने और मातहत अफसरों पर जरूरत से अधिक निर्भर होने से ऐसी नौबत आती है।शासन में वरिष्ठ पदों पर बैठे अफसर लंबे समय तक जमीन से कटे होते हैं।
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अगर मंत्री भी विषय की गंभीरता, उस निर्णय के संदेश और संवेदनशीलता पर ध्यान न दें तो अव्यावहारिक व पक्षपातपूर्ण फैसलों की संभावना बढ़ जाती है।ऐसे फैसलों की कीमत आम लोगों के साथ सरकार को ही चुकानी होती है। गौर करने वाली बात ये है कि यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है।
वित्त विभाग : केंद्र व राज्य के अफसरों में भेदभाव कर कराई किरकिरी
चुनाव का समय था और महंगाई भत्ता बढ़ाने का फैसला केंद्र सरकार ने समय से कर दिया। कुर्सी पर बैठे अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों ने अपना महंगाई भत्ता चुनाव आचार संहिता जारी होने के पहले जारी कर लिया, लेकिन प्रदेश के 20 लाख कर्मचारियों को छोड़ दिया।
अफसरों के इस भेदभावपूर्ण रवैये पर कर्मचारियों ने असंतोष जताना शुरू किया तब सरकार हरकत में आई। चुनाव आयोग की अनुमति लेकर कर्मचारियों को भी बढ़ा डीए दिया गया। 10 लाख पेंशनरों को भी अपना हक तब मिला, जब वे मुखर होकर सामने आए। सवाल ये है कि अखिल भारतीय सेवा के अफसरों का डीए जारी करते समय ही प्रदेश के कर्मचारियों का क्यों नहीं जारी किया गया? इससे सरकार की खासी किरकिरी हुई।
सचिवालय प्रशासन : विवाद निपटाते-निपटाते खुद ही पक्षकार बन गए साहब
सचिवालय प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव सचिवालय के सहायक समीक्षा अधिकारियों के वरिष्ठता विवाद का निपटारा करते-करते कब खुद एक पक्ष के पार्टी बन गए, पता ही नहीं चला। उन्होंने न सिर्फ अपने वरिष्ठ अफसरों के सुझाव को नजरअंदाज किया बल्कि सरकारी अधिवक्ताओं की राय को भी नहीं माना।
पसंद के अधिवक्ताओं की सलाह पर सुप्रीम कोर्ट गए, लेकिन वहां से भी राहत नहीं मिली। अवमानना की कार्रवाई प्रस्तावित होने और किसी भी स्तर से राहत न मिलने के बावजूद वह अड़ियल रुख अख्तियार किए रहे। नतीजा ये हुआ कि उन्हें पूरे दिन कोर्ट की हिरासत में रहने की सजा भुगतनी पड़ी। अब उसी आदेश का पालन भी करना है जिसके लिए यह नौबत आई। भद पिटी सरकार की।
औद्योगिक विकास : पहला शिलान्यास समारोह पांच महीने में, दूसरा साल भर में नहीं
मौजूदा सरकार ने फरवरी 2018 में पहली इन्वेस्टर्स समिट की। 4.68 लाख करोड़ रुपये के एमओयू हुए। सरकार ने इन एमओयू को जमीन पर उतारने के लिए नियमित अंतराल पर निवेशकों के प्रस्तावित प्रोजेक्ट के शिलान्यास समारोह (ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी) की योजना बनाई।
पहली ग्राउंड ब्रेकिंग पांच महीने के भीतर जुलाई में ही हो गई। सरकार ने एलान किया कि दूसरी ग्राउंड ब्रेकिंग अगले छह महीने में पहले से ज्यादा राशि के प्रोजेक्ट के साथ की जाएगी। पहले से भी बेहतर काम का हवाला देकर विभाग में नए प्रमुख सचिव की तैनाती कर दी गई। इस बीच लालफीताशाही इस कदर बढ़ी कि निवेशकों का यह कहना आम हो गया कि मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव से मिलना तो आसान है लेकिन प्रमुख सचिव से मिलना बेहद मुश्किल।
बढ़ा-चढ़ाकर दावे और पर्दे के पीछे के खेल का नतीजा ये रहा कि निवेशक प्रोजेक्ट पर काम बढ़ाने की जगह चुप्पी साध कर बैठ गए। हवा-हवाई तैयारी के दावे पर चुनाव के पहले सकारात्मक माहौल बनाने के लिए दूसरी ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी कानपुर में कराने का एलान कर दिया गया। मगर, जब तैयारी देखी गई तो सिफर साबित हुई। आनन-फानन में कार्यक्रम रद्द कर दिया गया। घोषणा के बावजूद कार्यक्रम न हो पाने से सरकार की खासी फजीहत हुई।
बेसिक शिक्षा : कटऑफ पर निर्णय की जगह झमेला कर कराई फजीहत
बेसिक शिक्षा विभाग नौकरियों के लिहाज से सबसे अहम व संवेदनशील रहता आया है। सरकार ने नामी अफसर को इसकी कमान दी। सरकार को उम्मीद थी कि चुनाव के पहले 69 हजार रिक्त पदों पर शिक्षकों की भर्ती कर सकारात्मक माहौल बनाएगी। सब कुछ पटरी पर चल रहा था कि विभागीय अफसरों को सनक सवार हो गई।
एक बार जिस फॉर्मूले से निर्विघ्न भर्ती पूरी हुई थी, उससे छेड़छाड़ शुरू कर दी। पहली भर्ती में कटऑफ रखी गई थी, लेकिन दूसरी भर्ती का विज्ञापन निकाला तो कटऑफ ही गायब हो गई। मेधावी विद्यार्थियों में इससे असंतोष बढ़ा तो सरकार हरकत में आई। आनन-फानन में कटऑफ तय की गई।
इस बार कटऑफ पिछली बार से भी ज्यादा। अब शिक्षामित्र नाराज हो गए जिनके लिए वेटेज के साथ भर्ती का यह आखिरी अवसर था। शिक्षामित्र हाईकोर्ट पहुंच गए। हाईकोर्ट ने न सिर्फ विज्ञापन में कटऑफ तय न करने पर सवाल उठाया बल्कि बाद में तय कटऑफ को रद्द कर पिछली भर्ती की कटऑफ बहाल कर दी। सरकार शिक्षामित्रों का मानदेय 3500 से बढ़ाकर 10 हजार कर अपनी पीठ ठोकती रह गई, लेकिन अफसरों ने कटऑफ का नया झमेला पेश कर सरकार की फजीहत करा डाली।
पत्नी डॉक्टर तो प्राइवेट प्रैक्टिस बंदी भत्ते का हो गया आदेश, वेतन संरक्षण पर कुंडली
एक अपर मुख्य सचिव हैं। उनकी पत्नी चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग में अधिकारी हैं। सरकार चिकित्सकों को प्राइवेट प्रैक्टिस पर प्रतिबंध के एवज में प्रैक्टिस भत्ता देती है। साहब की बीवी को भी इस भत्ते का लाभ मिलना था लिहाजा यह फाइल सर्वोच्च प्राथमिकता पर तैयार हुई।
10 मार्च को चुनाव आचार संहिता लागू होनी थी, नौ मार्च तक सारी औपचारिकता पूरी कर भत्ते में वृद्धि का आदेश जारी कर उसे लागू कर दिया गया। डॉक्टरों के प्राइवेट प्रैक्टिस बंदी भत्ते में वृद्धि के निर्णय पर किसी को एतराज नहीं है, लेकिन अब कर्मचारी इस मुद्दे पर तेजी से फैसले का हवाला देकर सवाल इसलिए उठा रहे हैं क्योंकि आम कर्मचारियों को एक सेवा से दूसरी सेवा में जाने पर मिलने वाला वेतन संरक्षण का शासनादेश जारी नहीं किया जा रहा है। इससे कर्मचारियों में जबर्दस्त नाराजगी है।