विरोधी हों या समर्थक हर किसी को इस बार अशोक सिंहल की कमी खल रही है। यह सही है कि सिंहल का हर साल 6 दिसंबर को अयोध्या में रहना जरूरी नहीं था लेकिन अब जबकि वह नहीं हैं तो इस तारीख पर उनकी याद हर व्यक्ति को किसी न किसी रूप में आ रही है। वह किसी के लिए खलनायक तो किसी के लिए नायक थे।
हाशिम की नजर में लकड़ी तोड़ने वाला उस जैसा शख्स मिलना अब मुश्किल है तो मंदिर के लिए पत्थर तराशने वाले कारीगर गिरीश भाई सोमपुरा के मुताबिक समय और हालात की चिंता किए बगैर लक्ष्य पाने के लिए सब-कुछ कर गुजरने वाली ‘वैसी शख्सियत’ की तलाश काफी कठिन है।
लोगों की यह राय यूं ही नहीं है। विरोधी भी यह स्वीकार करते हैं कि सिंहल ने जिस तरह मंदिर आंदोलन को लोगों तक पहुंचाया वह आसान काम नहीं था। अयोध्या के एक शख्स नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि विश्व हिंदू परिषद के लिए इस तरह का लड़ाकू आदमी तैयार करना मुश्किल होगा। बात आगे बढ़ाते हुए वह बोले- ‘हो कुछ भी लेकिन लड़ने में मजा दो से ही आया एक रामचंद्र परमहंस और दूसरे सिंहल।’
पेशे से शिक्षक मो. सलमान से एक मस्जिद के पास मुलाकात होती है। सिंहल के बारे में पूछने पर कहते हैं, ‘मैं तो बस्ती से यहां रिश्तेदारी में आया हूं। पर, सिंहल के बारे में जानता खूब हूं। मस्जिद तुड़वाने की जिद न करते और इस तरह के आंदोलन से न जुड़ते तो काफी अच्छे आदमी माने जाते।’
एक प्रमुख मुस्लिम नेता कहते हैं, ‘थे तो हिंदू-मुसलमानों की एकता के लिए खलनायक लेकिन गजब के जज्बे वाले थे। जो ठान लिया वह करके माने।’ इस सवाल पर कि तोगड़िया भी तो आग उगलते हैं, यह सज्जन जवाब देते हैं- ‘तोगड़िया हल्की बात करते हैं। गंभीर नहीं है।’ सिंहल हमारे कट्टर विरोधी थे लेकिन वह हल्की बात नहीं करते थे।