अगर आप कैलीफोर्निया के एडवेंचर का हिस्सा नहीं बन सकते तो साइंस सिटी में साइमैक्स ऑडिटोरियम में आपको यह मौका मिल सकता है।
आईमैक्स तकनीक का उपयोग कर अर्धगोलाकार पर्दे पर चलती-फिरती तस्वीरें हकीकत से रूबरू कराती हैं। यह दर्शकों को रोमांच से भर देती हैं।
इसके बाद यूपी में अलग तरह का यह शो लोगों में अपनी पहचान न बनाने के चलते गुमनाम होने की कगार पर है। दर्शक न मिलने के चलते आयोजकों के सामने शो रद करने तक की नौबत आ रही है।
अलीगंज स्थित साइंस सिटी में साइमैक्स के नाम से विज्ञान का एक अजूबा दिखाने की नींव 21 सितंबर 2007 को रखी गई। करीब 2.25 करोड़ रुपये के खर्च के बाद वर्ष 2008 के अंत में इस शो को शुरू कर दिया गया।
शुरूआत के बाद से ही यह शो गुमनामी के बीच बना रहा। हर रोज साइमैक्स ऑडिटोरियम में चार शो रखे जाते हैं। सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक चलने वाले हर एक शो की क्षमता 220 दर्शकों की है।
कभी भी एक शो के लिए 20-30 दर्शक से ज्यादा साइंस सिटी में मौजूद नहीं होते। जबकि इसके संचालन और रखरखाव पर हर साल 14 लाख रुपये खर्च होते हैं।
रविवार को खास शो के बाद भी यही हालत बनी हुई थी। खुद अधिकारियों का कहना है कि इसकी वजह राजधानी के लोगों के बीच साइमैक्स की खासियत की पहुंच नहीं होना है।
जो दर्शक मिल रहे हैं, वह भी काफी प्रयासों के बाद स्कूल व कॉलेज की विजिट से जुटाए जाते हैं। ऐसे में साइमैक्स शो को घाटे में चलाने के लिए प्रबंधन मजबूर है।
तकनीकी अधिकारियों के मुताबिक, साइमैक्स ऑडिटोरियम के पीछे असल में विज्ञान को मनोरंजन के साथ लोगों तक पहुंचाना था। साइमैक्स में हम सिनेमा को एक नए आयाम देने की कोशिश करते हैं। इसके पीछे आई-मैक्स तकनीक काम करती है।
इसके पीछे विज्ञान एक बहुत सामान्य सिद्धांत काम करता है। हमारी आंख की एक निश्चित कोण तक देखने की सीमा होती है। इसे पेरीफेरल व्यू कहते हैं।
इसी पेरीफेरल व्यू से ज्यादा सीमा का पर्दा और प्रोजेक्टर तैयार किया गया। इसके लिए फ्लैट स्क्रीन की जगह 20 मीटर व्यास का विशेष अर्द्धगोलाकार पर्दा साइ-मैक्स ऑडिटोरियम में है।
पूरी छत को कवर करता यह पर्दा पेरीफेरल व्यू से ज्यादा होने के चलते दर्शक को फिल्म के सीन में खुद भी शामिल होने का अहसास देता है।
जैसे किसी बर्फीले पहाड़ के सीन में खुद के हेलीकॉप्टर में होने या पुल के ऊपर ऊंचाई पर खुद मौजूद होने का अहसास होता है।