लखनऊ। लोहिया संस्थान की इमरजेंसी में पहुंच रहे मरीजों को प्राथमिक इलाज तो दूर स्ट्रेचर तक आसानी से नहीं मिल पा रहा है। बुधवार दोपहर यहां गंभीर हालत में निजी वाहन से लाए गए मरीज को स्ट्रेचर नहीं मिला। तीमारदार स्ट्रेचर के लिए एक से दूसरे विभाग दौड़ते रहे और इसी बीच मरीज ने इमरजेंसी के बाहर गाड़ी में ही दम तोड़ दिया। शरीर में कोई हरकत न होती देख तीमारदार मरीज को गाड़ी समेत इमरजेंसी गेट पर लेकर पहुंचे तो स्वास्थ्यकर्मियों ने बिना गाड़ी से उतारे ही ईसीजी कर उसे मृत घोषित कर दिया।
गोमतीनगर विस्तार के उमा शंकर गुप्ता (55) को यूरोलॉजी संबंधी समस्या थी। बुधवार सुबह अचानक पेशाब होना बंद हो गया। परिजन पहले उन्हें नजदीकी अस्पताल ले गए, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। इस पर बेटा किशन गुप्ता उन्हें निजी वाहन से लेकर करीब 12:50 बजे लोहिया संस्थान की इमरजेंसी पहुंचा। इमरजेंसी से पहले बैरियर लगा होने से गाड़ी वहीं रोक दी और परिजन स्ट्रेचर लेने चले गए। वे एक से दूसरे विभाग तक करीब 20 मिनट तक स्ट्रेचर के लिए दौड़ते रहे, लेकिन नहीं मिला। इसी बीच मरीज ने गाड़ी में दम तोड़ दिया। तीमारदार गाड़ी में चीखपुकार मचाने लगे तो गार्डों ने बैरियर हटाकर गाड़ी इमरजेंसी गेट तक भेजा। इसके बाद ईसीजी टेक्नीशियन व डॉक्टरों ने गाड़ी से मरीज को उतरवाए बिना ही ईसीजी कर उसे मृत घोषित कर दिया। बेटे किशन ने कहा कि समय से स्ट्रेचर मिल जाता तो इलाज शुरू हो जाता और शायद पिता की जान बच जाती।
संविधान हमें जीवन जीने की गारंटी देता है...
संविधान का अनुच्छेद-21 जीवन जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है। सर्वोच्च अदालत ने कई फैसलों में मेडिकल इमरजेंसी को भी इस अनुच्छेद की परिधि में माना है। स्पष्ट भी किया कि किसी को इमरजेंसी चिकित्सा देने से इनकार करना अनुच्छेद-21 का उल्लंघन है।
और हालात क्या..?
जब मरीज की जान बचाने के लिए हर पल कीमती होता है, चिकित्सा विज्ञान में जिसे गोल्डन ऑवर बताया गया है, उस दौरान इमरजेंसी सेवाओं में बेड नहीं होने का हवाला देकर लौटाया जाता है। रेफर करने का खेल चलता है। अस्पताल की लचर व्यवस्था और खामियों की वजह से मरीज दम तोड़ देता है। क्या ये जीवन जीने के अधिकार का छीना जाना नहीं?
150 मरीजों के लिए सिर्फ 15 स्ट्रेचर क्या काफी है
लोहिया संस्थान की इमरजेंसी में आने वाले मरीजों को आसानी से स्ट्रेचर न मिल पाने से कई तीमारदारों को मरीजों की जान बचाने के लिए उन्हें गोद उठाकर इमरजेंसी के अंदर लाना पड़ता है। बुधवार दोपहर को भी स्ट्रेचर के अभाव में तीमारदार मरीजों को गोद में उठाकर या कंधे पर लादकर ले जाते दिखे। इमरजेंसी में रोज करीब 150 से अधिक मरीज पहुंच रहे हैं, लेकिन मरीजों को अंदर स्ट्रेचर से ले जाने के लिए इमरजेंसी के बाहर सिर्फ 15 स्ट्रेचर ही लगाए गए हैं। मरीज अधिक होने पर स्ट्रेचर नहीं मिलता।
बिना आधार दिए नहीं देते स्ट्रेचर
इमरजेंसी के बाहर स्ट्रेचर देेने के लिए गार्ड को बिठाया गया है। यहां आने वाले मरीजों के तीमारदार पहले अपना आधार कार्ड जमा करते हैं, तब उन्हें स्ट्रेचर दिया जाता है। आधार नहीं होने पर कर्मचारी स्ट्रेचर देने में आनाकानी करते हैं। कर्मचारियों का कहना है कि मरीज के वार्ड में शिफ्ट होने बाद स्ट्रेचर इधर-उधर छोड़ दिया जाता है। इसलिए आधार जमा कराते हैं, ताकि तीमारदार काम होने के बाद स्ट्रेचर वापस अपनी जगह रखकर जाएं। बड़ा सवाल यह है कि मरीज गंभीर हालात में हो तो उसे फौरन अस्पताल ले जाएं या फिर आधार खोजें, उसे सहेजकर अपने पास रखें तब घर से निकलें।
रात से हो गई दोपहर...इलाज तो दूर, भर्ती के लिए चक्कर काटते रहे
बहराइच निवासी रामू पाल 65 वर्षीय पिता देवराम को लेकर मंगलवार रात लोहिया संस्थान की इमरजेंसी में पहुंचे। उन्हें इमरजेंसी में थोड़ी देर रखा गया। इसके बाद बेड खाली न होेने की बात कह केजीएमयू रेफर कर दिया गया। रात में वे केजीएमयू पहुंचे तो वहां भी यही जवाब मिला। रात भर ट्रॉमा सेंटर के बाहर पड़े रहे और सुबह फिर लोहिया संस्थान पहुंचे। दोपहर तक वे इमरजेंसी के सामने जमीन पर पिता को लिटाकर इलाज का इंतजार करते रहे।
विलय के बाद बढ़ गईं मुश्किलें
लोहिया अस्पताल का संस्थान में विलय होने के बाद सामान्य मरीजों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। इस समय कोरोना संक्रमण का तर्क देकर संस्थान की ओपीडी में आरटीपीसीआर जांच की अनिवार्यता रखी गई है। मजबूरी में जो मरीज इमरजेंसी पहुंचते हैं उनको या तो ओपीडी में दिखाने की सलाह दी जाती है या बेड खाली न होने की बात कह रेफर कर दिया जाता है। ऐसे में मरीज धक्के खाते रहते हैं।
ट्रांस गोमती में इलाज का एकमात्र बड़ा सेंटर
लोहिया संस्थान में यूं तो सबसे ज्यादा मरीज ट्रांसगोमती क्षेत्र के साथ ही बाराबंकी व अयोध्या से आते हैं। लखनऊ में ट्रांस गोमती क्षेत्र में यह इलाज का एकमात्र बड़ा सरकारी सेंटर है। लोहिया अस्पताल होने पर मरीजों को आसानी से इलाज मिल जाता था, लेकिन विलय के बाद कोर्स का संचालन शुरू हो गया है, पर इलाज का संकट बढ़ गया है।
फुटबॉल बनाने के ऐसे ही मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था
8 जून 1992 को पं. बंग खेत मजदूर समिति के सदस्य हाकिम शेख पश्चिम बंगाल के मथुरापुर स्टेशन पर ट्रेन से गिर गए थे। उन्हें सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए ले जाया गया लेकिन पांच सरकारी अस्पतालों में इमरजेंसी में इलाज नहीं मिला। पीड़ित मजदूर ने इसे अनुच्छेद-21 का उल्लंघन बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इनक्वायरी कमेटी का गठन किया था। जिसने अहम सुझाव दिए थे। सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि लोगों को चिकित्सा सुविधा मुहैया कराना राज्य का संवैधानिक दायित्व है। इसके लिए जो भी जरूरी हो किया जाना चाहिए।
जांच समिति ने यह दिए थे सुझाव
-इमरजेंसी में सेंट्रल बेड ब्यूरो बनाए जाएं ताकि बेड की उपलब्धता का पता रहे और मरीज को तुरंत वहां रेफर किया जा सके जहां बेड उपलब्ध हो।
-इमरजेंसी में पहुंचने वाले मरीज को बेड नहीं होने पर उसकी जान बचाने के लिए ट्रॉली या जरूरी होने पर जमीन पर भी इलाज किया जाए।
स्ट्रेचर पर इलाज के दौरान जिम्मेदार अफसर उन वार्डों का पता करें जहां बेड खाली हों, ताकि उसे वहां उसे शिफ्ट किया जा सके।