बुढ़ापे में होने वाली ऑस्टियोपोरोसिस यानी हड्डियों के खोखलेपन की बीमारी से शीशम बचाएगा। सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट ने शीशम के पेड़ में मौजूद रसायनों से इसके लिए दवा तैयार की है।
सीडीआरआई के वैज्ञानिकों का दावा है कि इस दवा का कोई साइड इफेक्ट नहीं है। ऑस्टियोपोरोसिस की शुरुआत होते ही इस दवा को लिया जाए तो यह अच्छा काम करती है।
दवा को गुजरात की एक फार्मा कंपनी के साथ मिलकर तैयार किया जाएगा। तकनीकी हस्तांतरण के लिए 24 फरवरी को सीडीआरआई कंपनी से करार करेगी।
सीडीआरआई के निदेशक डॉ. राम विश्वकर्मा ने बताया कि अभी एलेंड्रोनेट और बिसफॉस्फोनेट जैसी दवाओं को ऑस्टियोपोरोसिस में दिया जाता है।
इन दवाओं का पाचन शरीर नहीं कर पाता। इससे दवाएं शरीर के अंदर ही बनी रहती हैं। जिससे डायरिया, अंदरूनी रक्तस्राव, जोड़ों का दर्द जैसे साइड इफेक्ट सामने आते हैं।
सुरक्षित है ये दवा
सीडीआरआई के वैज्ञानिक सुरक्षित दवा की तलाश में थे। शीशम जिसे हम डैलबर्जिया सिसो या इंडियन रोजवुड के नाम से जानते हैं, देश में बहुतायत में पाया जाता है।
इसमें हड्डियों को मजबूत बनाने वाले जरूरी तत्व पाए जाने पर पिछले साल वैज्ञानिकों ने इससे दवा तैयार करने का काम शुरू किया।
शरीर में हड्डियों के बनने और क्षरण की प्रक्रिया हमेशा चलती रहती है। क्षरण और नए बनने की प्रक्रिया में असंतुलन ऑस्टियोपोरोसिस की ओर ले जाता है।
सीडीआरआई की हर्बल दवा हड्डी के बनने की प्रक्रिया को तेज करेगी। इससे ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा कम हो जाएगा।
पहले भारत के मरीजों को फायदा
डॉ. विश्वकर्मा का कहना है कि देश में कुपोषण की समस्या है। ऐसे में उम्र बढ़ने के साथ ऑस्टियोपोरोसिस की बीमारी घेरने लगती है।
40 साल की उम्र पार करने के बाद ही लोग ऑस्टियोपोरोसिस के शिकार हो रहे हैं। ऐसे में दवा को पहले भारतीय मरीजों को उपलब्ध कराने की शर्त करार में रखी जा रही है।
देश में ज्यादा उपलब्धता होने पर अंतरराष्ट्रीय बाजार का रुख किया जाएगा। कंपनी को नॉन एक्सक्लूसिव अनुबंध में यह तकनीक दी जा रही है जोकि एक तयशुदा समय के लिए ही रहेगा। संभवत: इसी साल दवा बाजार में आ जाएगी।