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अनाथालय भी कर रहे बच्चों को लेने से इनकार, कहां जाएं मासूम

Sun, 10 Jul 2016 08:50 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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demo pic - फोटो : amar ujala
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अपनों से बिछड़े या उन्हें खो चुके मासूम बच्चों की जिम्मेदारी उठाने से अब अनाथालय भी पीछे हट रहे हैं। राजधानी के अनाथालयों में लावारिस बच्चों का बचपन संकट में है।
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हालत यह है कि तीन निजी अनाथालयों में संसाधनों की कमी को देखते हुए जहां बाल कल्याण समिति बच्चे देने से इन्कार कर चुकी है, वहीं एक ने खुद ही बच्चे लेने से मना कर दिया है। इन हालात में तीनों राजकीय अनाथालयों में बच्चों की संख्या क्षमता से अधिक होती जा रही है।

राजधानी में 26 बाल गृह संचालित हो रहे हैं। इनमें से तीन सरकारी और बाकी निजी या अनुदानित हैं। आमतौर पर लावारिस बच्चे मिलने पर इन्हीं को सौंपा जाता था। यहां से उन्हें गोद देने की प्रक्रिया से जोड़ा जाता है, जो छह पंजीकृत संस्थानों के जरिये गोद दिए जाते हैं।
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इनमें संसाधनों की कमी और अव्यवस्था को देखते हुए बाल कल्याण समिति गंगोत्री, वरदान शिशु गृह और श्रीराम औद्योगिक अनाथालयों को बच्चे सौंपना बंद कर चुकी है। वहीं, अन्य अनाथालय क्षमता पूरी होने के कारण बच्चों को लेने से इनकार करने लगे हैं।

इसी वजह से बाल कल्याण समिति अब केवल राजकीय बाल गृहों में ही लावारिस बच्चों को सौंप रही है। इसमें सिर्फ लीलावती मुंशी बाल गृह अपवाद है, जहां नवजात शिशु आश्रय दिलाए जाते हैं।
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इस तरह की मुश्किले झेलते हैं अनुदानित बाल गृह

बाल कल्याण समिति के सदस्य अंशुमालि शर्मा बताते हैं कि अनुदानित बाल गृह सरकारी अनुदान के भरोसे होते हैं। पैसा नहीं मिलने पर सुविधाएं नहीं जुटा पाते, स्टाफ की भी कमी हो जाती है। इन सबका खामियाजा बच्चों को भुगतना होता है।

ऐसे में उन्हें बच्चे देने के बजाय राजकीय बाल गृहों को देना बेहतर होता है। कुछ निजी बाल गृह निश्चित रूप से अच्छा काम कर रहे हैं, वे अपने यहां ऐसे बच्चों को चाहते हैं जिन्हें वे लंबे समय तक अपने साथ रखकर पढ़ा-लिखा कर अच्छा नागरिक बना सकें।

राजकीय बाल गृहों में क्षमता से अधिक बच्चे
इस असंतुलन की वजह से राजकीय बाल गृहों में बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है। प्राग नारायण रोड स्थित बालगृह (शिशु) की क्षमता 50 बच्चों की है।

यहां 12 साल से छोटे बच्चों को रखा जाता है, लेकिन शनिवार को यहां 68 बच्चे मौजूद थे। इसी तरह मोतीनगर स्थित राजकीय बाल गृह (बालिका) और राजकीय बाल गृह (बालक) की क्षमता 100 है, लेकिन यहां भी 130 से 145 तक बच्चे मिले। वैसे ही बाल गृहों को कम संसाधन मिलते हैं, उसमें भी बच्चों की बढ़ी हुई संख्या की वजह से मुश्किलें बढ़ रही हैं।
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विशेष बच्चों के और बुरे हाल

- फोटो : demo pic
विशेष बच्चों को रखने से निजी व सरकारी, सभी तरह के बाल गृह आना-कानी करते हैं। इस वजह से ऐसे बच्चों को आश्रय दिलाने में चाइल्ड लाइन के सामने लगातार दिक्कतें आ रही हैं।

चाइल्ड लाइन के लखनऊ समन्वयक अजीत कुशवाहा बताते हैं कि इन बच्चों को रखने के लिए विशेष संसाधनों की जरूरत होती है, अलग से ख्याल भी रखना होता है। इसलिए उन्हें स्वीकारने से अनाथालय कतराते हैं।

दूसरी ओर दृष्टि और निर्वाण संस्थान ऐसे विशेष बच्चों के लिए काम करते हैं, लेकिन वे क्षमता से अधिक बच्चे अपने यहां रखे हुए हैं। तीनों राजकीय बाल गृहों की क्षमता भी इन बच्चों के लिए 25 ही है।

मनीषा मंदिर ने भी बच्चे लेना बंद किया
लावारिस लड़कियों के आश्रय पाने का प्रमुख स्थान रहे मनीषा मंदिर ने भी अब अपने यहां बच्चों को रखने से मना करना शुरू कर दिया।

संस्था द्वारा बाल कल्याण समिति को दी गई सूचना के अनुसार वे अब और बच्चों को अपने यहां नहीं रखेंगे। माना जा रहा है कि संस्था संचालन को बंद करने की ओर बढ़ाए जा रहे कदम के तहत ऐसा किया जा रहा है।
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