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मुख्यमंत्री, जिनके पास कॉफी के पैसे तक नहीं थे!

Sat, 07 Dec 2013 11:27 AM IST
अतुल भारद्वाज/लखनऊ
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‘वीरबहादुर सिंह जब मुख्यमंत्री बने, उसके बाद भी वह हजरतगंज स्थित कॉफी हाउस आते रहे। वह हमेशा अपने सुरक्षागार्ड और अधिकारियों को बाहर ही छोड़कर आते। आते ही पूछते...आज का एजेंडा क्या है?
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कॉफी और चर्चा दोनों खत्म होती। जेब में हाथ डालते। लेकिन, पेमेंट कोई दूसरा साथी ही करता। मुख्यमंत्री के पास खुद कभी पैसे जो नहीं होते थे।

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शुक्रवार को लखनऊ लिटरेचर कार्निवाल में कॉफी हाउस की बात चली तो राजनेताओं से लेकर शहर के दिग्गज पुराने किस्सागो के नाम और चेहरे सामने आते गए।

कॉफी हाउस से संसद का सफर
पुराने यारों की याद में आंखों में आए आंसुओं के बीच लखनऊ के कॉफी हाउस पर लिखी वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कुमार की किताब के कुछ अंशों को पढ़ा गया। वह कॉफी हाउस, जहां से अर्थपूर्ण चर्चाओं का हिस्सा बने लोग प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री तक बने।

वह कॉफी हाउस जो कभी हजरतगंज में गांधी आश्रम की जगह हुआ करता था। अब बदलते घटनाक्रम में अपने 50 साल के इतिहास में जहांगीराबाद के पास पहुंच गया।

शामिल हुए मजाज के भी किस्से
बुक रीडिंग सेशन में प्रदीप कुमार एक के बाद एक किस्से सुनाते गए। कॉफी के पेय पदार्थ बनने की कहानी से लेकर इसके समर्थक और खिलाफत वाले लोगों पर नाटक के मंचन तक बात पहुंची। उर्दू के नामचीन नाम जैसे मजाज से लेकर सहित्यिक और राजनीतिक सरोकारों पर चर्चा के किस्से भी शामिल हुए।
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किताब से निकले शब्द बताते गए कि कैसे चंद्रभानु गुप्ता और चरन सिंह जैसे चंद नेता कभी कॉफी हाउस नहीं आए। इन नेताओं के मुताबिक, कॉफी हाउस उनके खिलाफ साजिश रचने की जगह थी।
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चर्चा का ऐसा केंद्र कि अगर किसी को राजनीति पर लिखना होता। वह कॉफी हाउस चला आता। क्योंकि यहां सब कुछ एक ही जगह पर मिल जाता।
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