छतर मंजिल की बनावट अपने आप में नायाब हैं। दरअसल, यहां नीचे बेसमेंट बनवाया गया था, जोकि इतना बड़ा है, जहां नावें चलती थीं। यह बेसमेंट सीधे गोमती नदी से जुड़ा हुआ है। इससे बहू-बेगमें अपने कमरों से निकलकर सीधे बेसमेंट और फिर से नावों के जरिए गोमती नदी तक पहुंच जाती थीं।
बेगमों के लिए थी मछली-मोर वाली नावें
इतिहासकार योगेश प्रवीण ने बताया कि छतर मंजिल के नीचे बने बेसमेंट से चलने वाली नावें विशेष प्रकार की लकड़ी की होती थीं। जो बेहद मजबूत होती थीं। सामान्य नावों के अलावा बेगमों के लिए विशेष नावें बनाई जाती थीं, जिसे मोर व मछली के आकार में ढालते थे। इनमें खिड़कियां भी होती थीं। ऐसी तमाम नावों के रेखाचित्र मिल चुके हैं।
कोठी फरहत बख्श में क्लाउड मार्टिन रहा करता था। उसने बीच गोमती नदी तक जाने केलिए लकड़ी का पुल बनवाया था। यह एक प्रकार से स्टडी के लिए था, जो तीनों ओर से ढका था और उसमें खिड़कियां भी थीं। इस पुल से गोमती में चलने वाली नावों पर नजर रखने में भी मदद मिलती थी।
खोदाई के दौरान बरती जा रही सावधानी
‘खोदाई के दौरान गंडोला बोट मिली है, जिसे संरक्षित किया जाएगा। खोदाई का काम लगातार जारी है। छतर मंजिल का ऐतिहासिक महत्व है। लिहाजा यहां खोदाई केदौरान बहुत सावधानी बरती जा रही है।’ -एके सिंह, पुरातत्व निदेशक