लखनऊ नाम महज गुम्बदों मीनार नहीं, सिर्फ एक शहर कूंचा ओ बाज़ार नहीं।
इसके दामन में मुहब्बत के फूल खिलते हैं, इसकी गलियों में फरिश्तों के पते मिलते हैं!!
...एक शायर की कलम से
कहते हैं शहर का मिजाज पहचानने के लिए वहां की इमारतें ही काफी होती हैं, लेकिन अफसोस कि हममें से ज्यादातर लोग इस बात को नहीं समझ पाते।
हमारे शहर में ही तमाम ऐसी कोठियां हैं, जिन पर भले ही वक्त की गर्द जम चुकी हो लेकिन उनकी एक-एक ईंट में इतिहास सांस लेता है।
पेश है एक ऐसी ही श्रृंखला, जिसमें शहर की इन पुरानी कोठियों के बारे में रोचक कहानियां हैं।
आलमबाग कोठी- कभी यहां फांसी दी जाती थी...
यह कोठी नवाब वाजिद अली शाह ने अपनी पहली बेगम आलमआरा के लिए सन् 1847-1856 में बनवाई थी। आलमबाग में होने के कारण इसका नाम आलमबाग कोठी रख दिया गया।
नवाब ने सन् 1837 में जब निकाह किया, तब बेगम आलमआरा की उम्र महज 15 बरस थी। यह कोठी लखौरी ईंटों और चूने से बनाई गई।
एक वक्त था जब यह दो मंजिला कोठी अपनी भव्यता के लिए मशहूर थी, लेकिन बदकिस्मती से अब यह खंडहर में तब्दील हो रही है।
आज आप जिसे चंदर नगर गेट के नाम से जानते हैं वह इसी कोठी का दरवाजा है, जिसे कभी शाही दरवाजे के नाम से जाना जाता था।
दरवाजे के पास में ही बने हवादार कमरों में चौबीस घंटे द्वारपाल कोठी की निगरानी के लिए मुस्तैद रहा करते थे। वैसे क्या कभी आपने गौर किया है इस खबूसूरत दरवाजे की नक्काशी को...
अगर नहीं तो अगली बार जब उधर से गुजरिएगा तो दो पल रुककर जरूर देखिएगा। तब शायद आपको यह एहसास हो कि इस नायाब कोठी के साथ हमने कैसा रिश्ता निभाया है।
वैसे इस कोठी का नाम उस वक्त भी ध्यान में आता है, जब बात भारत स्वतंत्रता की 1857 में हुई पहली लड़ाई की होती है।
कहा जाता है कि जनरल हैवलॉक ने इस कोठी पर आक्रमण किया, जिससे यह कोठी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। बाद में अंग्रेजों ने इस कोठी का इस्तेमाल सैनिकों के अस्पताल के रूप में शुरू कर दिया।
यहां फांसी की सजा भी दी जाने लगी, इसी वजह से इसका नाम फांसी दरवाजा पड़ गया।