एक आईएएस अधिकारी सरकार की प्राथमिकता वाले कार्यों से जुड़े विभागों में से एक के सचिव थे। शासन के मुखिया चुनाव के दौरान सरकार की एक बहुप्रचारित योजना का टेंडर निकलवाना चाहते थे।
चुनाव आचार संहिता की वजह से आयोग ने इजाजत नहीं दी थी इसके बावजूद मुखिया का दबाव था कि बिना प्रचार के चुपचाप टेंडर करा दिया जाए। मामले की गंभीरता देखते हुए सचिव महाशय ने हाथ खड़े कर दिए।
दबाव ज्यादा बढ़ा तो विभाग से ट्रांसफर कराने की अर्जी लगा दी। लंबी छुट्टी पर चले गए। कुछ दिन बाद मुखिया का तबादला हो गया तो वह भी लौट आए और बदले माहौल में काम पर जुट गए।
पर, चुनाव बाद जब सरकार को फुर्सत मिली तो नियुक्ति वालों ने साहब की ट्रांसफर रिक्वेस्ट भी पेश कर दिया। और तो और निर्देश पालन में आनाकानी और छुट्टी पर चले जाने का फीडबैक भी दे दिया।
कुछ दिन पहले जब तीन दर्जन अफसरों के तबादले हुए तो सचिव साहब के ट्रांसफर वाली चिट्ठी पर कार्रवाई हो गई। हटाकर दूसरी जगह भेज दिए गए। साहब हक्का-बक्का। अंदाजा ही नहीं था कि मुखिया बदलने के बाद भी ऐसा हो सकता है।
अब अपने पैर पर खुद ही कुल्हाड़ी मारने का वाकया सुनाकर अपनों के बीच हंसी के पात्र भी बन रहे हैं। साथी मौज ले रहे हैं कि जब छुटटी पर चले ही गए थे तो ट्रांसफर की चिट्ठी लिखने की क्या जरूरत थी?