हैरानी की बात यह है कि टेंडर के आधार पर दो साल तक कंपनियों द्वारा पोषाहार की आपूर्ति बिना ‘बारकोडिंग’ के ही होती रही। सूत्रों के मुताबिक कई जिलों में खराब गुणवत्ता और पुराने व कम पौष्टिकता वाले पोषाहार पकड़े भी गए, लेकिन ‘बारकोडिंग’ न होने की वजह से किसी कंपनी व अधिकारी की जिम्मेदारी तय नहीं हो पाई। टेंडर की शर्तों के मुताबिक बारकोडिंग के लिए कंपनियों को अपने यहां ही मशीन लगानी थी।
कंपनियों ने तत्कालीन निदेशक राजेन्द्र कुमार सिंह से इसके लिए समय मांगा। तब राजेंद्र सिंह ने कंपनियों को पहली बार तीन महीने और दोबारा फिर तीन महीने का समय दे दिया। कुल मिलाकर शर्त भूलने के लिए अधिकारियों ने दो बार में छह महीने तक बारकोडिंग की व्यवस्था को लागू नहीं होने दिया। इसके बाद बाकी के डेढ़ साल तो किसी ने इस शर्त को लागू कराने की पहल ही नहीं की।
भाजपा एमएलसी ने उठाया था मुद्दा
पोषाहार आपूर्ति का ठेका वर्ष 2018 अप्रैल में दो साल तक के लिए पंजीरी सिंडिकेट के नाम से विख्यात उन 14 कंपनियों को दिया गया, जिनका यूपी में इस धंधे पर कब्जा है। तब टेंडर की शर्तों पर भी सवाल उठे थे। सत्ताधारी दल से एमएलसी देवेन्द्र प्रताप सिंह ने विधान परिषद में मामला उठाकर टेंडर निरस्त करने व जांच की मांग की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि जानबूझकर टेंडर में ऐसी शर्तें लगाई गईं ताकि सिंडिकेट के बाहर की कंपनियों को बाहर रखा जा सके।