प्रदेश के सरकारी महकमे पिछले 12 सालों के दौरान खर्च किए गए 66,625 करोड़ रुपये का हिसाब नहीं दे रहे हैं।
सरकारी खर्च पर नजर रखने वाले नियंत्रक व महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने वित्त विभाग से इस पर आपत्ति दर्ज कराई है।
इसके बाद वित्त विभाग ने उपभोग प्रमाण पत्र न देने वाले अफसरों की जवाबदेही तय करने की चेतावनी जारी कर दी है।
विधानसभा में पेश की गई रिपोर्ट
वित्तीय वर्ष 2001-02 से 2012-13 तक पैसा लेकर खर्च का ब्यौरा न देने वाले मामलों की संख्या 2.93 लाख तक पहुंच गई जबकि हिसाब न दी जानी वाली यह रकम 66,625.24 करोड़ रुपये पार कर गई है।
सीएजी ने प्रदेश के वित्तीय लेन-देन व खर्च को लेकर वित्तीय वर्ष 2012-13 तक विधानसभा में पेश रिपोर्ट में इस पहलू का भी खुलासा किया था। पर, सरकार ने उस पर ध्यान नहीं दिया। लिहाजा अफसरों ने भी रिपोर्ट को तवज्जो देना जरूरी नहीं समझा।
अब महालेखाकार (लेखा एवं हकदारी) ने वित्त विभाग को पत्र लिखकर लंबित उपभोग प्रमाण पत्रों का ब्यौरा न देने का मामला फिर से उठाया है। साथ ही याद दिलाया है कि ऐसे मामले बढ़ते जा रहे हैं जो उचित नहीं हैं।
विभागों के लिए ये हैं नियम
-सरकारी खजाने से प्राप्त रकम का इस्तेमाल होने के तत्काल बाद उसके उपभोग का ब्यौरा उपलब्ध कराया जाएगा।
-अगर 10 करोड़ रुपये तक की कोई योजना है तो रकम दो समान किश्तों में दी जाएगी। दूसरी किस्त का पैसा तभी मिलेगा, जब पहली किस्त का उपभोग प्रमाण पत्र मिल जाएगा।
-अगर कोई प्रोजेक्ट 10 करोड़ रुपये से अधिक का है तो 40-40 प्रतिशत रकम दो किस्तों में दी जाएगी। तीसरी किस्त 15 प्रतिशत की होगी।
मगर, एक किस्त के बाद आगे की रकम तभी मिलेगी जब 75 प्रतिशत उपभोग का प्रमाण पत्र मिल जाएगा। पांच प्रतिशत रकम गुणवत्ता जांच से संतुष्ट होने पर दी जाएगी।
बकाया उपभोग प्रमाण पत्रों की स्थिति
वर्ष--प्रमाण पत्रों की संख्या--रकम (करोड़ में)
2010-11 तक--2,52,424--51,811.32
2011-12--17,433--7,276.35
2012-13--23,967--7,537.57
योग--2,93,824--66,625.24
स्रोत-(विधानसभा में पेश सीएजी रिपोर्ट, 31 मार्च 2013 को समाप्त वर्ष पर आधारित।)
प्रमाण पत्र न देने को जिम्मेदार होंगे अफसर
मामले पर वित्त सचिव मुकेश मित्तल का कहना है कि समस्त प्रमुख सचिवों व सचिवों को कहा गया है कि वे अपने अधीनस्थ समस्त नियंत्रक अधिकारियों को निर्देशित कर दें कि जब वे वित्तीय वर्ष 2014-15 के प्रथम त्रैमास के प्राप्ति एवं व्यय के आंकड़ों का लेखा मिलान महालेखाकार कार्यालय से कराएंगे तो अपने साथ वित्तीय वर्ष 2001-02 से 2013-14 तक स्वीकृत किए गए अनावर्ती सहायता अनुदानों के उपयोगिता प्रमाण पत्र भी साथ में भेजेंगे।
अगर समय से उपयोगिता प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर समायोजन न करा सके तो इसके लिए वे व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होंगे।