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यूपी में हवा भाजपा के पक्ष में है या नहीं, पता करेगी बीजेपी

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भाजपा ने पंचायत चुनाव के बहाने विधानसभा चुनाव पर नजर गड़ा दी है। पार्टी के रणनीतिकार इसके जरिये विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा की जमीन की थाह लेना चाहते हैं।
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साथ ही पार्टी के लोगों की हैसियत का भी इम्तिहान ले लेना चाहते हैं, जिससे विधानसभा चुनाव के लिहाज से नेताओं की जिम्मेदारी तय करने और पार्टी के प्रदेश स्तरीय टीम के पुनर्गठन का काम ठीक तरह से किया जा सके।

जनाधार वालों को महत्व मिले तो गणेश परिक्रमा करने वालों को किनारे किया जा सके। मंशा कहीं न कहीं पार्टी के लोगों को विधानसभा चुनाव तक सक्रिय रखना और चुनावी लिहाज से संगठन के ढांचे को चुस्त-दुरुस्त करना भी है।
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सूबे में भाजपा के पंचायत चुनाव लड़ने की तैयारी के पीछे दूसरे राज्यों के अनुभव हैं। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र सहित जिन-जिन राज्यों में पार्टी पंचायत चुनाव में सक्रिय हिस्सेदारी लेती है, उनमें पार्टी का नीचे तक संगठनात्मक ढांचा बेहतर होता है।

इसके उलट यूपी और बिहार जैसे राज्यों में जहां पार्टी इन चुनाव में बहुत मुखर नहीं होती, वहां संगठनात्मक ढांचा न तो उतना मजबूत रह पाता है और न गतिशील। इसलिए पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह व प्रदेश प्रभारी ओम माथुर पंचायत चुनाव लड़ने पर जोर दे रहे हैं। इससे ढांचा तो दुरुस्त होगा ही, कार्यकर्ताओं की सक्रियता भी बनी रहेगी।

भाजपा का मकसद है ये

रणनीतिकारों का मानना है कि पंचायत चुनाव लड़ने से कम से कम हर जगह पार्टी के पास कुछ न कुछ ऐसे लोगों की टीम हो जाएगी जो चुनावी लिहाज से बूथ स्तर तक ढांचा खड़ा करने में मददगार बन सकेंगे। साथ ही इस चुनाव के बहाने गांव-गांव भाजपा की चर्चा भी रहेगी।

चुनाव लड़ने से केंद्र सरकार की उपलब्धियां भी गांव-गांव पहुंच जाएंगी। साथ ही यह भी पता चलेगा कि किस गांव में पार्टी का क्या जनाधार है। प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक कहते भी हैं कि मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे जिन राज्यों में पार्टी पंचायत चुनाव लड़ती है, वहीं संगठन का ढांचा नीचे तक मजबूत है।

पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अवधारणा ‘गांव से विकास’ को भी सच करना चाहती है। जब गांव की इकाई तक संगठन का तंत्र मजबूत होगा तभी ‘ग्राम सुराज’ का सपना साकार होगा। मौजूदा मोदी सरकार के कामकाज का लाभ गांव तक लोगों को मिलेगा। इसलिए चुनाव लड़ने का फैसला किया गया है।

गहराई से देखें तो बात इतनी भर नहीं है। कहीं न कहीं पार्टी हाईकमान पंचायत चुनाव के बहाने सदस्यता और महासंपर्क अभियान की असलियत भी जान लेना चाहता है।

अगर किसी गांव में पार्टी की प्रदेश इकाई या बूथ प्रवासी द्वारा दिए गए सदस्यता या महासंपर्क के आंकड़ों के विपरीत पार्टी को मिले वोटों की संख्या में बहुत अंतर होगा तो यह बात स्वत: स्पष्ट हो जाएगी कि भाजपा के दावे सिर्फ कागजों तक ही सिमटे हुए हैं। इस तरह की जानकारी से पार्टी को विधानसभा चुनाव के लिहाज से संगठन का ढांचा चुस्त-दुरुस्त करने में सहूलियत व समय दोनों मिल जाएगा।
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गांव-गांव भाजपा का नारा

समझा जा सकता है कि पंचायत चुनाव लड़ने के फैसले से भाजपा को तात्कालिक बहुत लाभ न हो लेकिन ‘गांव-गांव भाजपा’ का नारा सार्थक करने के लिहाज से काफी मदद मिल जाएगी।

जिस तरह पंचायतों को सीधे केंद्र सरकार से पैसा दिया जा रहा है, उस लिहाज से भी देखें तो भाजपा का फैसला दूरगामी नतीजों पर नजर रखकर किया गया लगता है। इस प्रयास से भाजपा को नीचे तक ऐसा तंत्र खड़ा करने में मदद मिलेगी जो हर दृष्टि से भाजपा की ताकत बढ़ाने का काम करेगा।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से लेकर प्रदेश प्रभारी ओम माथुर तक जिस तरह यूपी में पंचायत चुनाव को लेकर सक्रिय हैं उससे साफ है कि उनका फोकस इस पर है। अध्यक्ष बनने के बाद शाह जब-जब उत्तर प्रदेश के दौरे पर आए तो उन्होंने पंचायत चुनाव लड़ने पर ज्यादा जोर दिया।

प्रदेश प्रभारी ओम माथुर तो पंचायत चुनाव लड़ने के एजेंडे पर न सिर्फ प्रदेश मुख्यालय पर बल्कि क्षेत्रवार बैठकें कर चुके हैं। अब जिलावार बैठकों की तैयारी है। इन बैठकों में पार्टी के पंचायतों से जुड़े मौजूदा व पूर्व जनप्रतिनिधि बुलाए जा रहे हैं।

प्रदेश मुख्यालय पर 15 अप्रैल को लखनऊ में हुई बैठक में वर्तमान व पूर्व सांसदों तथा विधायकों को बुलाकर उन्हें अपने-अपने क्षेत्र की पंचायतों के चुनाव में पार्टी के बेहतर प्रदर्शन की जिम्मेदारी सौंपी जा चुकी है।

पार्टी के सह प्रभारी सुनील ओझा पूर्वांचल से लेकर झांसी तक दौरा कर चुके हैं। दौरे के दौरान उनका भी फोकस मुख्य रूप से पंचायत चुनाव पर ही रहा।

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