यूपी के चुनावी नतीजों ने भाजपा को असीमित खुशी दी
है, तो मुस्लिमों को खौफनाक अंधेरी राह की आशंका भी दे दी है। 19 फीसदी से अधिक मुस्लिम आबादी वाले प्रदेश से एक भी मुसलमान का लोकसभा के लिए न चुना जाना सेक्यूलर इंडिया के लिए भी खतरनाक है।
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ में उर्दू विभाग के अध्यक्ष डा. असलम जमशेदपुरी कुछ ऐसी ही बात करते हैं।
वह कहते हैं कि आजादी के बाद ऐसी स्थिति पहली बार हुआ है कि मुस्लिम वोट सपा-बसपा, कांग्रेस व कहीं-कहीं आप में बंटा।
न चाहकर भी मुसलमान अंतिम समय तक भ्रम में रहा और यह तय नहीं कर पाया कि भाजपा को तगड़ी चुनौती कौन दल या व्यक्ति दे सकता है। इसी ऊहापोह में वह खाली हाथ रह गया।’
नंबर एक पर नहीं पहुंच पाया मुस्लिम उम्मीदवार
जमशेदपुरी की यह बात किसी हद तक वाजिब भी लगती है क्योंकि रामपुर व मुरादाबाद जैसी सीटों पर भी मुस्लिम उम्मीदवार नंबर एक पर नहीं पहुंच पाया, जिन क्षेत्रों में मुसलमानों की आबादी 50 फीसदी के करीब है।
दरअसल मुसलमानों के दिलोदिमाग में मोदी का हौव्वा तो अवश्य रहा, पर सेक्यूलर दलों से खिन्नता के कारण वह यह तय नहीं कर पाया कि किसके पक्ष में एकजुट हुआ जाए।
अगर पिछले विधानसभा चुनाव पर नजर डाली जाए तो साफ है कि मुसलमानों ने टूटकर सपा को वोट दिया। पर मुजफ्फरनगर दंगे के बाद स्थितियां बिलकुल बदल गई।
दंगों की वजह से मुस्लिम सपा से हुए दूर
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के शिक्षक डॉ. आफताब आलम कहते हैं, ‘दंगों के बाद सपा मुसलमानों की पहली पसंद नहीं रही।
पर सपा से नाराजगी के बावजूद मुसलमानों में बसपा या कांग्रेस के प्रति सहानुभूति नहीं पैदा हुई क्योंकि मायावती वीभत्स दंगों के दौरान एक बार भी वहां नहीं गई और कांग्रेस ने खानापूर्ति के लिए ही सब किया।
चूंकि मुसलमानों के दिलो दिमाग में मोदी के नाम का हौव्वा था इसलिए उसने इन भाजपा विरोधी दलों को वोट तो दिया पर किसी से दिल दिमाग से नहीं जुड़ा।
किसी को सपा से ज्यादा एलर्जी थी तो किसी को बसपा या कांग्रेस से। लिहाजा निगेटिव वोटिंग हुई और कहीं सपा को तो कहीं बसपा या कांग्रेस में चला गया।
लोकसभा में कौन उठाएगा इनकी आवाज
सबसे चिंतनीय पहलू यह है कि अब उत्तर प्रदेश के मुसलमानों के सवाल संजीदगी से लोकसभा में नहीं उठ पाएंगे।
एक पुराने समाजवादी नेता कहते हैं कि मुस्लिम वोटों के बंटने के कारण न केवल सपा, बसपा व कांग्रेस गर्त में गए बल्कि पीस पार्टी, कौमी एकता दल व उलेमा काउंसिल जैसे संगठन स्थितियों के गुबार में खो गए।
पर हर अंधेरे में उम्मीद की एक किरण देखने वाले डॉ. जमशेदपुरी कहते हैं ‘अब मुसलमानों में इस बात का पश्चाताप है कि वे चुनाव में गोलबंद नहीं हुए।’
उनका मानना है कि अगले चुनाव में निश्चित ही बिना किसी फतवे या मुनादी के किसी एक छाते तले गोलबंद होंगे। शर्मनाक पराजय उम्मीद का रास्ता भी दिखाएगी।
मुस्लिम बहुल संसदीय क्षेत्र
रामपुर, मुरादाबाद, कैराना, बिजनौर, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, संभल, अमरोहा, बलरामपुर, श्रावस्ती, बरेली, बहराइच, घोसी, पीलीभीत, लखनऊ , बाराबंकी, बदायूं, पीलीभीत व आजमगढ़।
2009 में जीते मुस्लिम उम्मीदवार (सात)
मुरादाबाद- अजहरुद्दीन (कांग्रेस)
सीतापुर- कैसर जहां (बसपा)
संभल- शफीकुर्रहमान बर्क (बसपा)
मुजफ्फरनगर- कादिर राणा (बसपा)
कैराना- तबस्सुम हसन (बसपा)
फर्रुखाबाद- सलमान खुर्शीद (कांग्रेस)
लखीमपुर खीरी-जफर अली नकवी (कांग्रेस)
2014 के चुनाव में मुस्लिम प्रत्याशी
बसपा-19, सपा-13, कांग्रेस-11, भाजपा-0