यह सुनने में बहुत अजीब लगे कि गांव में विकास न होने की वजह से लड़कों की शादियां नहीं हो पाती हैं, पर यह सच है।
और यह तस्वीर कहीं और की नहीं, मुलायम सिंह यादव के निर्वाचन क्षेत्र मैनपुरी के किशनी विधानसभा के गांव हाजीपुर की है।
60 वर्षीया मार्गश्री दुखड़ा रोती हुई कहती हैं कि ‘बरसात में हम कुएं के मेढक हो जाते हैं। गांव चारों तरफ पानी से घिर जाता है, घरों की देहरी तक पानी हरहराता रहता है। कोई रिश्तेदार नहीं आता। घर से बाहर निकलना दूभर होता है।
जरूरी कामों से बाहर निकलने पर कई बार पैरों में पनिहल सांप लिपट जाते हैं। हम छटपटा के रह जाते हैं। करें क्या...। घर-गांव तो छोड़ नहीं सकते।’ बगल में खड़ी अनुपम यादव घूंघट की ओट से कहती हैं- ‘मैं तो हर साल चार महीने के लिए मायके चली जाती हूं।’
बताती हैं, ‘सिर्फ वही नहीं गांव की अधिकतर बहुएं बरसात में मायके चली जाती हैं।’ बरसों से हालात ऐसे हैं कि इस गांव में लड़कों की शादी मुश्किल से होती है।
गांव का 46 वर्षीय गिरन्द सिंह यादव कहता है कि ‘मैं अपने मां-बाप का इकलौता हूं, पर गांव की समस्याओं के कारण कोई शादी का प्रस्ताव लेकर ही नहीं आया।’
इटावा में लॉयन सफारी, मैनपुरी में कुछ नहीं
जिले में समस्याएं कई हैं, मसलन बरनाल इलाके में गर्मियों में पानी की समस्या सबसे ऊपर है।
इलाके में औद्योगिकीकरण के नाम पर भी कुछ नहीं हुआ। पर कहीं भी कोई सवाल इतना प्रभावी नहीं हो पाता कि मुलायम के खिलाफ मुद्दा बन जाए।
कहीं कोई नाराजगी मुलायम विरोध की राजनीतिक गोलबंदी में तब्दील होती नहीं दिखती। विरोधी दल भी अपनी आवाज का मतलब समझते हैं, इसलिए किसी भी मुद्दे को भरपूर ताकत से उठाते ही नहीं।
वरिष्ठ वकील अशोक मिश्रा कहते हैं कि मुलायम सिंह जिले की पहचान भी हैं और जरूरत भी। उम्मीद भी सिर्फ उन्हीं से है, इसलिए शिकायत भी उन्हीं से।
मुलायम से पहले मैनपुरी में तंबाकू के सिवा जिले की पहचान वाला कोई मैटीरियल था क्या? पर मुलायम की कर्मभूमि होने के बावजूद यहां इटावा की तुलना में लेशमात्र विकास नहीं हुआ।
कहां, इटावा में लॉयन सफारी, पीजीआई, स्टेडियम और न जाने क्या-क्या। पर यहां तो जिले में चलने लायक सड़कें तक नहीं हैं। रश्क नहीं होगा तो क्या?
मैनपुरी मुलायम का दत्तक पुत्र
बार काउंसिल के जिला अध्यक्ष अशोक मिश्रा मुलायम मैनपुरी के साथ दत्तक पुत्र सा व्यवहार करते हैं। पॉलीटेक्निक व दूरदर्शन केंद्र को छोड़ दें तो मैनपुरी में आज जो कुछ भी है, जितना भी है मुलायम सिंह की वजह से है।
पर उतना नहीं जितने का वह हकदार है। मैनपुरी को आज देश-विदेश में मुलायम की वजह से जाना जाता है। मुलायम ने सड़कों का नेटवर्क दिया, पुल दिए, इंजीनियरिंग कॉलेज व अस्पताल दिया।
पर कोई बड़ी इंडस्ट्री नहीं दी जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार भी पैदा होता और जिले का विकास भी।
मैनपुरी की तुलना में सैफई व इटावा पर मुलायम ने ज्यादा ध्यान दिया। अपेक्षा करते हैं कि मुलायम कर्मस्थली को जन्मस्थली से कम महत्व नहीं देंगे।
मुलायम ने विकास भी कराया
ऐसा नहीं कि मुलायम यहां के विकास की लगातार अनदेखी करते रहे हैं। हाल ही में एक सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज की घोषणा को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इटावा-कुरावली मार्ग को फोर लेन कराने में मुलायम का ही योगदान माना जा रहा है। सड़कों की हालत भी काफी सुधरी है।
मैनपुरी में तंबाकू के अधिक इस्तेमाल के कारण यहां मुंह के कैंसर से पीड़ित लोगों की तादाद बहुत ज्यादा है। इसी समस्या के मद्देनजर मुलायम ने अपने पिछले कार्यकाल में यहां कैंसर यूनिट भी खुलवा दी थी।
यह बात अलग है कि प्रबंधन के अभाव में करोड़ों की मशीनें धूल खा रही हैं और पीड़ित लोगों को इलाज के लिए आगरा व कानपुर जाना पड़ता है, पर अधिकांश लोगों के लिए सबसे बड़ा सुख यह है कि वह देश के एक बड़े नेता से जब चाहें तब सीधे बात कर सकते हैं।
यह बात मैनपुरी के लोगों में विशिष्ट भाव भरती है। क्षेत्र में तमाम लोग यह बताते मिल जाएंगे कि कब उनके यहां मुलायम सिंह का फोन आया था या वह खुद आए थे, या लखनऊ बुलवाकर कुशलक्षेम पूछी थी।
सपा के सरकार में होने पर सत्ता प्रतिष्ठान में मिलने वाला अति महत्व भी मैनपुरी के लोगों को मुलायम के साथ लामबंद होने को मजबूर करता है।
मैनपुरी बाजार में मिले रामकुमार यादव कहते हैं, हर नेता के पक्ष व विपक्ष में बातें होती हैं। पर जहां तक मुलायम व मैनपुरी की बात है, नेताजी जिले की पहचान व शान हैं। कोई अपनी पहचान को नहीं नकारता।
इसलिए तमाम गिले-शिकवों के बावजूद मुलायम सिंह को यहां कड़ी चुनौती नहीं मिल पाती।
पर, शहर के एक गल्ला व्यापारी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि मुलायम से कोई परेशानी नहीं पर प्रदेश में सपा की सरकार होने पर सपा के लोग जिस तरह से गुंडई करते हैं वह बर्दाश्त के बाहर होता है, पर कौन मुंह खोले?
मुलायम के अलावा कोई विकल्प भी तो नहीं
मुलायम सिंह यादव ने इटावा और सैफई की तुलना में मैनपुर पर कम ध्यान दिया। लेकिन समय-समय पर मैनपुरी के लिए विकास की छोटी-बड़ी परियोजनाएं लाना उनके लिए फायदेमंद रहा है।
यही वजह रही है कि यहां के लोगों को उनके अलावा कोई दूसरा विकल्प नजर नहीं आता है।
हाजीपुर गांव के दिनेश यादव बताते हैं कि समस्याओं को लेकर पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान चुनाव के बहिष्कार की घोषणा हुई थी और काले झंडे लगाए गए थे।
सपा प्रत्याशी बृजेश कठेरिया (अब विधायक) के आश्वासन के बाद विरोध-प्रदर्शन खत्म कर दिया गया। पर हमारी समस्या जस की तस है।
समस्याओं का निराकरण न होने पर सरकार व प्रशासन के प्रति दिनेश नाराजगी जताते हैं। पर लोकसभा चुनाव का जिक्र करने पर कहते हैं कि गांव का शत-प्रतिशत वोट नेताजी (मुलायम सिंह यादव) को ही जाएगा।
तर्क देते हैं कि और किसको वोट दिया जाए, क्या किसी और ने मैनपुरी के लिए कुछ किया है? कह सकते हैं कि मुलायम के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।
गढ़ दरकाने की कोशिश
मुलायम की ताकत और प्रभाव से वाकिफ होने के बावजूद विरोधी पक्ष इस बार कुछ ज्यादा हुनहुनाया है।
बसपा प्रत्याशी संघमित्रा (बसपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी) पिछले तीन महीने से क्षेत्र में सक्रिय हैं। उनकी कोशिश अपना दायरा बसपा के आधार वोट बैंक से बढ़ाकर कुछ अन्य जातियों व वर्गों को जोड़ने की है।
छुटपुट रिस्पांस मिल भी रहा है। इस बीच आम आदमी पार्टी ने लंबे समय तक पीसीएस अफसरों के नेता रहे बाबा हरदेव सिंह को प्रत्याशी बनाया है।
बाबा ने भी मैनपुरी में डेरा डाल दिया है और गांव-गांव घूमकर क्षेत्र में सपा की गुंडागर्दी खत्म करने के नाम पर वोट मांग रहे हैं।
बाबा मुलायम की कितनी जमीन तोड़ पाएंगे, यह तो समय ही बताएगा पर मुलायम के खिलाफ तीखी बयानबाजी करके सुर्खियों में जरूर रहेंगे।
...इसलिए नहीं फिक्रमंद
क्षत्रिय कल्याण परिषद के अध्यक्ष रामबाबू कुशवाहा कहते हैं कि लोकसभा क्षेत्र में करीब 36-37 फीसदी यादव मतदाता हैं जो मुलायम की जीत सुनिश्चित करने को काफी है।
इन लोगों को इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ता है कि सूबे में विकास कहां और कितना हो रहा है।
जीत के प्रति आश्वस्ति का भाव उन्हें जिले के विकास के प्रति फ्रिकमंद नहीं बनाता। वीआईपी क्षेत्र के मतदाता होने का अहसास सिर्फ बिजली से होता है।
सभी सीटों पर सपा का कब्जा
विधानसभा चुनाव 2012 में सभी सीटों पर सपा का कब्जा रहा है।
मैनपुरी सदर से राजकुमार उर्फ राजू यादव 54990 वोट मिले वहीं करहल से सोबरन सिंह यादव 92536 वोटों से विजयी रहे।
किशनी विधानसभा क्षेत्र से बृजेश कठेरिया ने 77113 वोटों से जीत का परचम लहराया वहीं भोगांव से आलोक कुमार को 70298 वोट मिले।