कोविड-19 के नये वैरिएंट ओमिक्रॉन पर मौजूदा इलाज पर्याप्त नहीं है। इस वैरिएंट को आपात स्थिति मानते हुए इलाज के नये विकल्प तलाशने होंगे।
केजीएमयू के सेंटर फॉर एडवांस रिसर्च और विश्व के अन्य संस्थाओं के साथ हुए शोध में यह दावा किया गया है। यह रिसर्च नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन जर्नल में प्रकाशित हुआ है। दावा है कि यह शोधपत्र ओमिक्रॉन वैरिएंट पर प्रत्यक्ष रूप से हुआ पहला रिसर्च पेपर भी है।
शोध के अनुसार नये वैरिएंट का संक्रमितों के शरीर की कोशिकाओं के साथ ज्यादा अटैचमेंट पाया गया है। इससे वायरस मरीज के शरीर में ज्यादा वक्त तक बना रहता है।
यही कारण है कि ओमिक्रॉन की संक्रमण क्षमता पुराने वैरिएंट से ज्यादा है। ऐसे में इलाज के अन्य उपाय तलाशने होंगे। वर्तमान में उपलब्ध इलाज के तरीके पर्याप्त नहीं है।
इसलिए नये वैरिएंट का प्रसार या तीसरी लहर के खतरे को देखते हुए आपात स्थिति मानकर इलाज की व्यवस्था की जानी चाहिए।
एंटीबॉडी, वैक्सीन की प्रभावशीलता और भयावहता पर शोध जारी
शोध पत्र के अनुसार, ओमिक्रॉन का शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता, इस पर वैक्सीन के असर और व्यक्ति पर इसकी मारक क्षमता का स्तर मापने के लिए अभी और शोध किया जाना है। नये वैरिएंट में लगातार बदलाव हो रहा है। इसकी वजह से ही एंटीबॉडी, वैक्सीन के प्रभाव और इसकी संक्रमण क्षमता को ध्यान में रखते हुए और शोध हो रहे हैं।
छह गुना ज्यादा संक्रामक है नया वैरिएंट
ओमिक्रॉन पहले के मुकाबले छह गुना ज्यादा संक्रामक है। इसका ज्यादा संक्रामक होना संक्रमित पर मारक या घातक होगा या फिर नहीं, अभी इस पर स्थिति साफ नहीं है। वायरस ने डेल्टा वैरिएंट के बाद करीब 15 बार अपना रूप बदला है। माना जा रहा है कि किसी कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले व्यक्ति में वायरस के स्वरूप में यह बदलाव हुआ है। वायरस का नया वैरिएंट साउथ अफ्रीका में एक एचआईवी-एड्स पीड़ित व्यक्ति में सबसे पहली बार मिला था। इसलिए यह जाहिर है कि कम प्रतिरोधक क्षमता वालों में इसका असर ज्यादा है।
केजीएमयू के साथ ही विश्व की कई संस्थाएं रहीं शामिल
केजीएमयू के सेंटर फॉर एडवांस रिसर्च के साथ ही इस रिसर्च में द वर्ल्ड सोसाइटी फॉर वाइरोलॉजी, द इंडियन वाइरोलॉजी सोसाइटी सेंटर फॉर एमर्जिंग जोनोटिक एंड पैरासाइटिक डिसीजेस, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ कम्युनिकेबल डिसीजेस ऑफ द नेशनल हेल्थ लैबोरेटरी सर्विस जोहान्सबर्ग साउथ अफ्रीका, डिपार्टमेंट ऑफ माइक्रोबायोलॉजी कॉलेज ऑफ मेडिसिन सऊदी अरब, डिपार्टमेंट ऑफ वाइरोलॉजी बेनी-सूइफ यूनिवर्सिटी इजिप्ट, इस शोध में योगदान रहा है।