लखनऊ। हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक अहम आदेश में स्पष्ट किया कि किसी आपराधिक मामले में पुराने वकील से अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) लेना केवल सदाचार की प्रक्रिया है, कोई कानूनी अनिवार्यता नहीं। यदि नया वकील अपने मुवक्किल द्वारा विधिवत अधिकृत है तो वह बिना एनओसी के भी जमानत याचिका दाखिल कर सकता है।
न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान व न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने यह टिप्पणी अलीगंज क्षेत्र से संबंधित दहेज हत्या के मामले में सजायाफ्ता मनोरमा शुक्ला की अपील में दाखिल दूसरी जमानत अर्जी मंजूर करने के आदेश में की है। कोर्ट ने कहा कि अपील लंबित रहने तक ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाया गया पूरा जुर्माना स्थगित रहेगा।
अपीलकर्ता मनोरमा शुक्ला को अगस्त 2021 में अपर सत्र न्यायाधीश, लखनऊ की अदालत ने दहेज हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। अपीलकर्ता की ओर से वकील ज्योति राजपूत पेश हुईं। वह समाजसेवी संस्था से जुड़कर निशुल्क कानूनी सहायता प्रदान कर रही थीं। अधिवक्ता ने जेल से निष्पादित व विधिवत सत्यापित वकालतनामे के आधार पर जमानत अर्जी दाखिल की, लेकिन अपीलकर्ता के पूर्व वकील ने एनओसी देने से मना कर दिया था।
पीठ ने यह भी कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो जमानत अर्जी दाखिल करने के लिए वकालतनामे को अनिवार्य शर्त घोषित करता हो। हालांकि, न्यायालय की प्रक्रिया के अनुसार किसी वकील को अधिकृत किए जाने का प्रमाण आवश्यक होता है। (संवाद)