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सपा सरकार के लिए मुसीबत बन सकते हैं नए राज्यपाल

Thu, 19 Jun 2014 03:05 AM IST
अनिल श्रीवास्तव/अमर उजाला, लखनऊ
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बीएल जोशी के स्थान पर एनडीए सरकार की ओर से नियुक्त किए जाने वाले नए राज्यपाल से तालमेल बिठाना राज्य सरकार के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगा।
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अखिलेश सरकार का जोशी के साथ ठीकठाक तालमेल चल रहा था और अभी तक राजभवन व सरकार के बीच किसी मामले को लेकर टकराव की नौबत नहीं आई।

कुछ विषयों को लेकर विवाद की स्थिति बनी भी तो केंद्र में सत्तारूढ़ यूपीए के सहयोगी के नाते बातचीत करके हल निकाल लिया गया, लेकिन अब राजनीतिक हालात बदल गए हैं।

समाजवादी पार्टी को लेकर भाजपा के रुख को देखते हुए नए राज्यपाल के आने के बाद प्रदेश सरकार के राजभवन से रिश्तों को लेकर सियासी गलियारों में तरह तरह की चर्चाएं हैं।
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जोशी ने नहीं किया विवाद

बीएल जोशी के इस्तीफे के बाद प्रदेश के नए राज्यपाल को लेकर अटकलें लगाई जाने लगी हैं। जोशी गैर राजनीतिक माने जाते हैं। मायावती सरकार से लेकर अखिलेश सरकार तक उन्हें लेकर किसी तरह का विवाद खड़ा नहीं हुआ।

रामपुर के अपने जौहर विश्वविद्यालय को लेकर आजम खां ने गाहे-बगाहे भले ही राजभवन पर निशाना साधा हो पर जोशी की तरफ से किसी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की गई।

मार्च 2012 में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद लोकायुक्त की पुनर्नियुक्ति को लेकर तनातनी की स्थिति बनी जरूर, लेकिन मामला सुलझा लिया गया। इसी तरह पिछले साल मुजफ्फरनगर दंगे के बाद राज्यपाल की ओर से भेजी गई रिपोर्ट को लेकर राजभवन पर अंगुली उठी लेकिन जोशी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की।

अब जोशी के जाने के बाद सरकार के प्रति राजभवन के रुख में बदलाव आने के आसार हैं और इसका असर दोनों के बीच रिश्तों पर भी पड़ना तय माना जा रहा है।

ये है भाजपा की योजना

जानकारों का कहना है कि 2017 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर केंद्र सरकार यूपी के राजभवन में किसी ऐसे व्यक्ति की तैनाती चाहती है जो उसके मन मुताबिक राज्य के हालात पर नजर रख सके।

यूपी के राज्यपाल के लिए जिन नामों की चर्चा हैं उनमें राम नाइक, कैलाश जोशी, विजय कुमार मल्होत्रा प्रमुख हैं। भाजपा राजनीतिक व्यक्ति को राजभवन में बैठाकर आगामी विधानसभा चुनाव में इसका फायदा भी लेना चाहती है।

सूत्रों की मानें तो राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले राज्यपाल के साथ तालमेल बिठाना राज्य सरकार के लिए मुश्किल होगा क्योंकि दोनों ही तरफ से अपने-अपने राजनीतिक हितों के हिसाब से निर्णय लिए जाएंगे और ऐसे में टकराव की स्थिति बन सकती है।

सूत्रों का कहना है कि राजभवन और सरकार के बीच रिश्ते काफी कुछ इस पर भी निर्भर होंगे कि राज्यपाल की सक्रियता कितनी रहती है। जोशी सरकार के कामकाज में ज्यादा दखलंदाजी नहीं करते थे। भाजपा की कोशिश राज्यपाल के जरिये सरकार पर नियंत्रण रखने की होगी।
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कांग्रेस हाईकमान के करीबी थे जोशी

बीएल जोशी अपने यूपी में लगभग पांच साल के कार्यकाल में विवादों से दूर ही रहे। वह पहले राज्यपाल थे जिन्हें यूपी में ही लगातार दोबारा राज्यपाल बनने का मौका मिला।

पहली बार वह 28 जुलाई 2009 को राज्यपाल बनकर आए। 12 अप्रैल 2012 को उनका कार्यकाल समाप्त हो गया लेकिन उनकी जगह किसी राज्यपाल को नहीं भेजा गया। वह पद पर बने रहे। 6 मार्च 2014 को उन्हें दोबारा प्रदेश राज्यपाल नियुक्त किया गया।

केंद्र में एनडीए सरकार बनने के बाद उनकी विदाई तय मानी जा रही थी। केंद्र सरकार उनसे इस्तीफा मांगती इससे पहले ही उन्होंने स्वेच्छा से अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। जोशी कांग्रेस हाईकमान के करीबी माने जाते हैं।

यही वजह है कि वह कई राज्यों के राज्यपाल पद पर रहे। उनके आने के बाद राजभवन आम लोगों के लिए खुला। व्यवहारकुशल जोशी लोगों से खूब मिलते-जुलते, लेकिन सरकार के कामकाज को लेकर उन्होंने सार्वजनिक रूप से कभी कोई टिप्पणी नहीं की।
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