मुसलमानों के सर्वोच्च धार्मिक संगठन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड मुस्लिम महिला बिल 2017 को आगे न बढ़ाए जाने के लिए लोकसभा और राज्यसभा सदस्यों के जरिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाएगा। इसके तहत सभी राजनीतिक दलों के लोकसभा और राज्यसभा सदस्यों को पत्र भेजे जा रहे हैं।
बोर्ड ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भेजकर एक साथ तीन तलाक पर पाबंदी लगाने वाले बिल के खिलाफ मुहिम की शुरुआत कर दी है। बोर्ड के चेयरमैन मौलाना सैयद राबे हसनी नदवी की ओर से प्रधानमंत्री को भेजे पत्र में बिल की खामियां गिनाई गई हैं।
साथ ही बीती 24 दिसंबर को राजधानी के नदवा में हुई कार्यकारिणी बैठक में लिए गए फैसले से अवगत कराते हुए बिल को आगे न बढ़ाने की गुजारिश की गई है।
पत्र में कहा गया है कि यह बिल मुस्लिम महिलाओं के हित के खिलाफ और तलाकशुदा महिलाओं व उनके परिवार को नुकसान पहुंचाने वाला है। साथ ही शरीयत के नियमों के खिलाफ तथा मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप है। यह देश में प्रचलित अन्य कानूनों तथा 22 अगस्त 2017 को उच्चतम न्यायालय के दिए निर्णय की मूल भावना के भी खिलाफ है।
बोर्ड ने सुझाव दिया कि अगर सरकार इस संबंध में कानून बनाना जरूरी समझ रही है तो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और ऐसे मुस्लिम महिला संगठनों से परामर्श ले जो सच में मुस्लिम महिलाओं का प्रतिनिधित्व करते हों।
बोर्ड ने बिल का हर स्तर पर विरोध करने की रणनीति बनाई है। सचिव जफरयाब जीलानी ने बताया कि सभी सियासी पार्टियों के सांसदों के अलावा जनता को बिल के विरोध में तैयार किया जाएगा।
हैदराबाद बैठक में बनेगी रणनीति
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बिल के संबंध में केंद्र पर दबाव बनाने की मुहिम की जिम्मेदारी बोर्ड के महासचिव मौलाना वली रहमानी को सौंपी गई है। फरवरी के दूसरे सप्ताह में हैदराबाद में होने वाली बोर्ड की बैठक में आगे की रणनीति तैयार की जाएगी।
बिल के इन बिंदुओं पर एतराज
गुजरात की महिलाओं से बीजेपी को वोट देने की अपील करतीं मुस्लिम महिलाएं।
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बिल की धारा 2 (बी) में तलाक की दी गई परिभाषा उच्चतम न्यायालय से अवैध घोषित हो चुकी तलाके बिदअत से आगे बढ़कर की गई है। उच्चतम न्यायालय ने तलाके बायन को गैरकानूनी नहीं ठहराया है लेकिन धारा 2 (बी) को धारा 3 के साथ पढ़ने पर तलाके बायन को भी शून्य और गैर कानूनी घोषित किया जा सकता है।
उच्चतम न्यायालय ने तलाके बिदअत को मान्य नहीं माना है, फिर भी धारा 4 के तहत इसे कठोर दंडीय अपराध में बदल दिया गया है। तीन साल तक कठोर कारावास देना महिला और उसके बच्चों को पालन-पोषण से पूरे तौर पर वंचित करने का कारण बन सकता है।
तलाकशुदा महिलाओं को नाबालिग बच्चों की अभिरक्षा के प्रावधान में बच्चे की भलाई के मूलभूत सिद्धांत को सामने नहीं रखा गया है।
आपराधिक प्रक्रिया संहिता को लागू करते समय व्यभिचार से संबंधित मौजूदा कानून को भी सामने नहीं रखा गया है। मुकदमा किसी तीसरे की पहल पर प्रभावित महिला की मर्जी के खिलाफ भी चलाया जा सकता है जिसका महिला पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।