मुसलिम समाज के लोग अपने जीते जी पुरखों की कब्र के पास ही कब्रिस्तान में जगह पाने की ख्वाहिश में वसीयत कर रहे हैं। यहां तक कि समाज के कुछ लोग कफन की खरीद के साथ ही इंतकाल के बाद चालीसवें का फातिहा (संस्कार) भी करा चुके हैं। इस दिशा में मुसलिम समाज की सोच के पीछे अलग-अलग कारण बताए जा रहे हैं।
कुछ लोगों ने कब्र में दफन होने के लिए कफन को भी पहले से खरीद कर अपने पास सुरक्षित रख लिया है। जब जायरीन हज यात्रा पर जाते हैं तो वह खरीदा हुआ कफन सऊदी अरब में आब-ए-जमजम (पवित्र जल) से धुलवा लेते हैं।
हज पर न जा पाने वाले लोग भी हज यात्रियों के जरिए कफन आब-ए-जमजम से धुलवा कर मंगवा लेते हैं। बांसमंडी के हाजी परवेज अहमद, इफ्तिखाराबाद के हाजी नफीस खां और उनकी पत्नी महनाज ने बताया कि उनके पास आब-ए-जमजम से धुला कफन है। परिजनों को बता दिया गया है कि इंतकाल के बाद इस कपड़े से ही उन्हें कफनाया जाए।
मरने से पहले करवा रहे हैं 40वें का फातिहा
मुस्लिम कब्रिस्तानों में जगह की कमी कहें या पुरखों के बीच दफन होने की इच्छा, कुछ लोगों ने जगह की वसीयत कराई है। चमनगंज पेशकार रोड के हाजी अब्दुल रशीद, बेकनगंज के निसार अहमद ने अवामी कब्रिस्तान में मनचाही जगह पर दफन होने के लिए परिजनों को वसीयत कर दी है।
कई सुन्नी मुसलमानों ने इंतकाल के पहले ही मौत के चालीसवें दिन होने वाली फातिहा को पहले करा लिया है। गम्मू खां हाता के बुजुर्ग इलियास ने बताया कि उन्हें शंका थी कि शायद उनके परिजन मरने के बाद उनके चालीसवें का फातिहा न कराएं। इसलिए पहले ही फातिहा करा लिया है। अब किसी के फातिहा में खाना नहीं खाते हैं।
‘फातिहा कराना नेक अमल है। चाहे मरने के पहले कराया जाए या बाद में। अगर इस डर से कि औलादें उनकी चालीसवें का फातिहा नहीं कराएंगी तो वह पहले करा लें, ऐसा कोई शरई मसला नहीं है। अगर लोग करा लेते हैं तो नेक अमल का सवाब मिलेगा।
मौलाना आलम रजा नूरी, शहरकाजी
शहर के कब्रिस्तानों में लोग मनचाही जगह पर अपने पूर्वजों की कब्रों के पास दफन होने की इच्छा की वसीयत करते हैं। मरने के बाद उनकी कब्र के लिए जगह दी जाती है।
मोईनुद्दीन, अध्यक्ष, मुस्लिम इत्तेहाद कब्रिस्तान कमेटी