अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर बनाए जाने के संबंध में शिया वक्फ बोर्ड की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे को लेकर उलमा एकमत नहीं हैं। शिया उलमा जहां शिया वक्फ बोर्ड के रुख का समर्थन कर रहे हैं, वहीं सुन्नी समुदाय के उलमा इसे अयोध्या मामले में बेवजह का दखल मान रहे हैं।
जमीन की मिल्कियत का मामला : फरंगी महली
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य व सुन्नी धर्मगुरु मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली का कहना है कि मस्जिद अल्लाह का घर होती है। मस्जिद में शिया व सुन्नी दोनों नमाज पढ़ते हैं। यह शिया व सुन्नी फिरके का नहीं, बल्कि जमीन की मिल्कियत का मामला है। शिया उलमा पर्सनल लॉ बोर्ड की तरफ से हाईकोर्ट में अपनी गवाही दर्ज करा चुके हैं। इसलिए इतनी देर के बाद यह मुददा उठाना बेमानी है।
हलफनामे की कानूनी हैसियत नहीं : जिलानी
बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक जफरयाब जिलानी का दावा है कि शिया वक्फ बोर्ड की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे की कोई कानूनी हैसियत नहीं है। जिलानी का कहना है कि हलफनामे में जो बातें कही गई हैं, वे कभी हाईकोर्ट के सामने नहीं आईं जबकि शिया वक्फ बोर्ड 1989 से अयोध्या मामले में पार्टी है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट में कोई नई दलील व बात नहीं कही जा सकती।