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तीन तलाक के खिलाफ अध्यादेश से लोग निकाह करने से डरेंगे, मुस्लिम लीडरों ने गिनाई अच्छाई और खामियां

Wed, 19 Sep 2018 09:08 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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केंद्र सरकार की ओर से तीन तलाक पर पाबंदी लगाने वाले अध्यादेश पर ‘अमर उजाला’ ने देश की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले उत्तर प्रदेश के धर्मगुरुओं, ट्रिपल तलाक के खिलाफ काम कर रहीं मुस्लिम महिला एक्टिविस्ट्स और पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्यों से बातचीत की। जहां कुछ ने अध्यादेश का स्वागत  किया, वहीं कुछ ने सजा के प्रावधान को अलोकतांत्रिक माना। प्रभावित महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा का कोई प्रावधान न रखे जाने के लिए सरकार की आलोचना की।

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अध्यादेश लोकतंत्र के लिए सही नहीं
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य, मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने कहा कि अध्यादेश लाकर तीन तलाक को अपराध बनाना लोकतंत्र के बुनियादी उसूलों के खिलाफ है। तीन तलाक पर बिल को विपक्षी पार्टियों और मुस्लिम संगठनों ने सलेक्ट कमेटी में भेजने और वहां से फैसला आने के बाद उसके मुताबिक कानून बनाने की मांग की थी। बिल के विरोध में देश भर में लाखों मुस्लिम महिलाओं ने सड़क पर उतरकर विरोध-प्रदर्शन किया था। सरकार ने सभी की मांगों और विरोध को नजरअंदाज कर अध्यादेश पास किया, यह लोकतंत्र के लिए सही नहीं है।

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सुलह की गुंजाइश हो जाएगी खत्म

शाइस्ता अंबर - फोटो : amar ujala
ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर ने कहा, सरकार ने तीन तलाक पर अध्यादेश लाकर उसे अपराध बना दिया है, इससे पति व पत्नी के बीच सुलह की गुंजाइश खत्म हो जाएगी। तलाक सामाजिक बुराई है, लेकिन इसे अपराध बनाने से लोग शादियां करने से ही डरने लगेंगे। कानून ऐसा होना चाहिए जिससे शौहर एक साथ तीन तलाक देने से डरे और सुलह की गुंजाइश भी बनी रहे। कानून में तीन तलाक को अवैध घोषित किया जाए, साथ ही दोनों को संबंध सुधारने का मौका दिया जाए। सरकार इसे अपराध घोषित न करे।

'कानून बनाना अच्छा लेकिन इसकी खामियां दूर करना ज्यादा जरूरी है'

मुस्लिम वीमेन लीग की महासचिव नाईश हसन - फोटो : amar ujala
मुस्लिम वीमन लीग की महासचिव नाईश हसन का कहना है कि तीन तलाक के खिलाफ कानून बनना अच्छा है, लेकिन इसकी खामियां दूर करना ज्यादा जरूरी है। हमारी मांग बिल में सुधार की थी लेकिन उसे नजरअंदाज किया जा रहा है। वहीं, इस अध्यादेश में तीन साल की सजा का प्रावधान ज्यादा है, इसे कम किया जाए। पति को अगर जेल हो जाएगी, तो पीड़ित महिला और उसके बच्चों का गुजारा कैसे होगा, यह साफ नहीं है। सरकार महिला की आर्थिक समस्या का हल भी निकाले।

गुजारे-भत्ते का क्या होगा?

बज्म-ए-ख्वातीन की अध्यक्ष बेगम शहनाज सिदरत - फोटो : amar ujala
बज्म-ए-ख्वातीन की अध्यक्ष बेगम शहनाज सिदरत ने कहा, अध्यादेश से एक साथ तीन तलाक देने के मामलों में कमी आएगी। हमारी लड़ाई तलाकशुदा महिलाओं व उनके बच्चों को आर्थिक मदद दिलवाने की भी है। वहीं, एक साथ तीन तलाक की केवल शिकायत पर ही पति को जेल भेज देना ठीक नहीं है। गिरफ्तारी से पहले जांच करने और अदालत में मामला जाने के बाद सरकारी खर्च पर महिलाओं को वकील मुहैया कराने का प्रावधान अध्यादेश में शामिल है या नहीं, इसका खुलासा होना चाहिए।

सरकार ने बता दिया, वह मुस्लिम महिलाओं के साथ

शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी - फोटो : amar ujala
शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन सैयद वसीम रिजवी का कहना है कि तीन तलाक पर अध्यादेश मुस्लिम महिलाओं की जीत और कट्टरपंथी मौलानाओं की हार है। ट्रिपल तलाक की वजह से मुस्लिम महिलाओें पर सदियों से अत्याचार होता रहा है। तलाक के बाद बच्चों की जिम्मेदारी भी महिलाओं को उठानी होती थी। सरकार ने महिलाओं की तकलीफ को महसूस किया और सख्त कानून बनाया। सरकार ने अध्यादेश लाकर साफ कर दिया है कि वह मुस्लिम महिलाओं के साथ खड़ी है।
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'कानून को न मानने के दोषी व्यक्ति को सजा होनी ही चाहिए'

मौलाना सैफ अब्बास - फोटो : amar ujala
शिया चांद कमेटी के अध्यक्ष मौलाना सैफ अब्बास नकवी का कहना है कि अध्यादेश स्वागत योग्य है। इसमें देश के संविधान के मुताबिक कानून का उल्लंघन करने वालों को सजा का प्रावधान है। ऐसे में किसी भी कानून को न मानने के दोषी व्यक्ति को सजा होनी ही चाहिए। अध्यादेश लाने का मकसद महिलाओं को सुरक्षा देना है। अध्यादेश में जिन बिंदुओं को लेकर संशय है, सरकार को चाहिए कि उनमें सुधार करे। जो कानून बनाए जाएं, उनमें सभी की सहमति होनी चाहिए।
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