ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर ने कहा, सरकार ने तीन तलाक पर अध्यादेश लाकर उसे अपराध बना दिया है, इससे पति व पत्नी के बीच सुलह की गुंजाइश खत्म हो जाएगी। तलाक सामाजिक बुराई है, लेकिन इसे अपराध बनाने से लोग शादियां करने से ही डरने लगेंगे। कानून ऐसा होना चाहिए जिससे शौहर एक साथ तीन तलाक देने से डरे और सुलह की गुंजाइश भी बनी रहे। कानून में तीन तलाक को अवैध घोषित किया जाए, साथ ही दोनों को संबंध सुधारने का मौका दिया जाए। सरकार इसे अपराध घोषित न करे।
मुस्लिम वीमेन लीग की महासचिव नाईश हसन
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मुस्लिम वीमन लीग की महासचिव नाईश हसन का कहना है कि तीन तलाक के खिलाफ कानून बनना अच्छा है, लेकिन इसकी खामियां दूर करना ज्यादा जरूरी है। हमारी मांग बिल में सुधार की थी लेकिन उसे नजरअंदाज किया जा रहा है। वहीं, इस अध्यादेश में तीन साल की सजा का प्रावधान ज्यादा है, इसे कम किया जाए। पति को अगर जेल हो जाएगी, तो पीड़ित महिला और उसके बच्चों का गुजारा कैसे होगा, यह साफ नहीं है। सरकार महिला की आर्थिक समस्या का हल भी निकाले।
बज्म-ए-ख्वातीन की अध्यक्ष बेगम शहनाज सिदरत
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बज्म-ए-ख्वातीन की अध्यक्ष बेगम शहनाज सिदरत ने कहा, अध्यादेश से एक साथ तीन तलाक देने के मामलों में कमी आएगी। हमारी लड़ाई तलाकशुदा महिलाओं व उनके बच्चों को आर्थिक मदद दिलवाने की भी है। वहीं, एक साथ तीन तलाक की केवल शिकायत पर ही पति को जेल भेज देना ठीक नहीं है। गिरफ्तारी से पहले जांच करने और अदालत में मामला जाने के बाद सरकारी खर्च पर महिलाओं को वकील मुहैया कराने का प्रावधान अध्यादेश में शामिल है या नहीं, इसका खुलासा होना चाहिए।
शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी
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शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन सैयद वसीम रिजवी का कहना है कि तीन तलाक पर अध्यादेश मुस्लिम महिलाओं की जीत और कट्टरपंथी मौलानाओं की हार है। ट्रिपल तलाक की वजह से मुस्लिम महिलाओें पर सदियों से अत्याचार होता रहा है। तलाक के बाद बच्चों की जिम्मेदारी भी महिलाओं को उठानी होती थी। सरकार ने महिलाओं की तकलीफ को महसूस किया और सख्त कानून बनाया। सरकार ने अध्यादेश लाकर साफ कर दिया है कि वह मुस्लिम महिलाओं के साथ खड़ी है।
शिया चांद कमेटी के अध्यक्ष मौलाना सैफ अब्बास नकवी का कहना है कि अध्यादेश स्वागत योग्य है। इसमें देश के संविधान के मुताबिक कानून का उल्लंघन करने वालों को सजा का प्रावधान है। ऐसे में किसी भी कानून को न मानने के दोषी व्यक्ति को सजा होनी ही चाहिए। अध्यादेश लाने का मकसद महिलाओं को सुरक्षा देना है। अध्यादेश में जिन बिंदुओं को लेकर संशय है, सरकार को चाहिए कि उनमें सुधार करे। जो कानून बनाए जाएं, उनमें सभी की सहमति होनी चाहिए।