सोशल साइटों पर चुनावी चहल-पहल बढ़ती जा रही है। नेता मैदान में अपने विरोधियों पर जहर उगल रहे हैं तो उनके समर्थक सोशल साइटों पर विरोधी दल के नेताओं के खिलाफ आग।
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सवाल ये है कि सोशल साइटों पर अपने नेताओं का बचाव करने वाले ये लोग क्या बूथ पर आकर अपने नेताओं के लिए वोट भी करेंगे? पिछले कुछ चुनावों के अनुभव बताते हैं कि वोटिंग को लेकर आम लोगों में, खासतौर पर नौजवानों में संजीदगी आई है।
उन्हें मताधिकार के हक का महत्व समझ में आ गया है। अब उनमें वोटिंग को लेकर निराशा का पहले जैसा भाव नहीं रहा। मतदाताओं को जागरूक करने के लिए चुनाव आयोग और मीडिया की मिली-जुली भूमिका इसकी मुख्य वजह रही।
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आम लोगों को भी लगने लगा है कि केवल राजनीतिक दलों की आलोचना से कुछ हासिल नहीं होने वाला है, सियासी सूरत तो मतदान से ही बदली जा सकती है।
यही वजह है कि वोट प्रतिशत में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। यह लोकतंत्र की मजबूती के लिए बेहद अच्छे संकेत हैं।
20 फीसदी बढ़ गई लखनऊ में वोटिंग
यूपी विधानसभा के लिए 2012 के चुनाव के दौरान लखनऊ का वोट प्रतिशत 56 फीसदी जबकि दूसरे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में वोट फीसदी औसतन 55 से 59 फीसदी के बीच रहा।
खुश होने वाली बात यह थी कि जिस लखनऊ ने इससे पहले के चुनाव में महज 36 फीसदी मतदान किया था, उसी ने लोकतंत्र के इस पर्व में यह आंकड़ा 56 फीसदी पहुंचा दिया।
वोट प्रतिशत में 20 फीसदी के इस उछाल को मामूली बदलाव नहीं माना जा सकता है। यह एक ऐसा बदलाव था जिसेे लोकतंत्र और वोटतंत्र के प्रति लोगों में बढ़ती आस्था के रूप में देखा जा सकता है।
व्यवस्था में बदलाव के लिए वोट
मतदान के प्रति निराश लोगों ने व्यवस्था में बदलाव के लिए वोट किया और सुखद यह रहा है कि प्रदेश में पूर्ण बहुमत के साथ एक नई सरकार चुनी गई जिसका नेतृत्व एक युवा मुख्यमंत्री कर रहे हैं।
फिलहाल हम इस बहस में नहीं उलझना चाहेंगे कि नई सरकार ने कैसा काम किया, लेकिन यह सुखद रहा कि लोगों को बूथों के जरिये बदलाव करने की ताकत का एहसास हुआ।
इसका देशव्यापी असर हुआ। उसी एहसास का नतीजा है कि पिछले साल 5 राज्यों में हुए चुनाव में वोट फीसदी बढ़कर 80 तक जा पहुंचा है।
24 फीसदी नए वोटर तैयार
यूपी में इस बार वोटरों का यह दम एक बार फिर दिखने वाला है। वोट फीसदी का यह आंकड़ा औसतन 80 फीसदी के आसपास रहने की उम्मीद है।
यानी लगभग 24 फीसदी नए वोटर अपने हक का इस्तेमाल करेंगे। ये नए वोटर क्या सोचकर और क्या देखकर अपना वोट करेंगे इस पर एक राय नहीं हो सकती।
इनमें से अधिसंख्य वोटरों का नजरिया निश्चित ही नया रहने वाला है। जाहिर है ये बदलाव के लिए वोट करेंगे। लेकिन ये कहना मुश्किल है कि वे कैसा बदलाव चाहते हैं?
ये हो सकते हैं इनके मुद्दे
हालांकि यह कहना जरा मुश्किल है कि इनके मुद्दे क्या हैं? लेकिन उनके मुद्दे कुछ ऐसे हो सकते हैं।
जैसे, हराकहरवे साफ-सुथरी छवि के उम्मीदवार के लिए वोट करेंगे या फिर अनुभवी नेताओं के लिए? वे एक-दूसरे पर आरोप लगाने वाले को ही अपना नुमाइंदा चुनेंगे या उनका वोट अपने क्षेत्र के नए प्रत्याशी के लिए होगा?
वे अपनी जाति के उम्मीदवार को जिताने के लिए वोट करेंगे या फिर केंद्र में स्थायी सरकार बनाने के लिए? भ्रष्टाचार और महंगाई उनके लिए बड़ा मुद्दा है या फिर सियासी पाखंड और अपराधियों से राजनीति को मुक्त कराना?