लखनऊ को कहा तो बाबुओं का शहर जाता है लेकिन यहां के माहौल में पता नहीं ऐसी क्या खास बात है जो हर आदमी को यहां की सियासत में रमने-जुड़ने और सियासी संसार में अपनी शख्सियत को संवारने तथा पैर जमाने को बेकरार कर देती है।
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हो सकता है कि लखनऊ को इसीलिए नवाबों का शहर कहा जाता हो। कभी कांग्रेस का गढ़ तो फिर अटल का घर बनने वाले लखनऊ का मिजाज देखिए कि चुनाव में यहां का विकास बहुत बड़ा मुद्दा नहीं बन पाता।
कभी-कभार किसी हिस्से में सड़क, स्कूल व अस्पताल की बात उठना दीगर बात है। मुद्दा सिर्फ अटल बिहारी वाजपेयी के लखनऊ के किले पर परचम फहराकर शान बरकरार रखने या बढ़ाने का रहता है।
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मतदाताओं की भी प्राथमिकता अभी तक उन चेहरों को ही दिल्ली दरबार में भेजने की रही है जो जिससे उनकी शान बढ़े। जिसकी अपनी पहचान हो। स्वराजवती नेहरू से लेकर लालजी टंडन तक लखनऊ ने यही संदेश दिया है।
गौरव को खाते में दर्ज कराने की जद्दोजहद
ऐसी ही जद्दोजहद इस बार भी दिख रही है। भाजपा और कांग्रेस अपनी-अपनी विरासत की शान के लिए मैदान में हैं।
सपा और बसपा की कोशिश है कि वे अपने उम्मीदवारों के जरिये लखनऊ के गौरव को अपने खाते में भी दर्ज कर लें।
भाजपा ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को मैदान में उतारकर अटल की विरासत का दावा ठोंक दिया है तो कांग्रेस ने कभी अपने गढ़ और पार्टी नेता हेमवती नंदन बहुगुणा को सबसे ज्यादा फीसदी मत दिलाकर विजय दिलाने वाले लखनऊ में उनकी पुत्री रीता बहुगुणा जोशी को मैदान में उतारकर चुनावी लड़ाई को विरासत बनाम विरासत में तब्दील करने की कोशिश की है।
कुल मिलाकर भाजपा अटल की विरासत बचाने तो कांग्रेस हाथ से निकल चुकी विरासत को पाने में लगी है तो वहीं सपा यह बताने में जुटी है कि विधानसभा चुनाव में लखनऊ में सपा को बढ़त संयोग नहीं बल्कि शहर का मिजाज बदलने का सबूत है।
शहरी क्षेत्रों में भी सपा का दखल बढ़ा है। बसपा यह बताने के लिए मैदान में है कि लखनऊ किसी नाम व पहचान से बंधा नहीं है।
सपा का रहा 'ब्राह्मण समीकरण'
लखनऊ के सामाजिक समीकरण ब्राह्मण, कायस्थ, वैश्य व मुस्लिम मतदाताओं के रुझान से प्रभावित होते हैं।
इसीलिए सपा ने पहले यहां से अशोक वाजपेयी को उतारकर ब्राह्मण व मुस्लिम समीकरणों को साधकर सफलता पाने की सोची थी।
पर, भाजपा से राजनाथ सिंह के आने के बाद सपा ने अशोक वाजपेयी की जगह प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री अभिषेक मिश्र को मैदान में उतार दिया है। अभिषेक लखनऊ की ही उत्तर सीट से विधायक हैं।
सपा को उम्मीद है कि पहली बार विधायक चुने गए अभिषेक के युवा चेहरे की चमक के साथ ब्राह्मण मतदाताओं में सेंधमारी और मुस्लिम मतदाताओं की लामबंदी से उसकी उम्मीदें बढ़ सकती हैं।
बसपा ने खेला नकुल पर दांव
बसपा ने भी ब्राह्मण चेहरे नकुल दुबे को उतारकर ब्राह्मण मतदाताओं में सेंधमारी और परंपरागत दलित वोटों के सहारे अपने लिए उम्मीदें पाली हैं।
पिछली बार गाजियाबाद से सांसद चुने गए राजनाथ सिंह के लखनऊ आने की मुख्य वजह भी अटल की विरासत के साथ लखनऊ के सामाजिक समीकरण ही माने जा रहे हैं।
भाजपा और खुद राजनाथ को उम्मीद है कि अटल से जुड़ाव के कारण ब्राह्मण मतदाता उन्हें वोट देगा ही।
उधर, आम आदमी पार्टी ने फिल्म अभिनेता जावेद जाफरी को उतारकर 4.5 लाख मुस्लिम वोटों को साधने की कोशिश की है।
नए समीकरणों के संकेत
वैसे तो लखनऊ लोकसभा सीट पर 1991 में अटल बिहारी वाजपेयी की जीत के बाद से भाजपा का लगातार कब्जा चला आ रहा है।
पर, 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद समीकरण काफी बदल चुके हैं। वजह अटल की अनुपस्थिति हो, भाजपा की गुटबाजी हो या खींचतान। 2009 के चुनाव में लालजी टंडन यहां कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी से मात्र 38 हजार वोटों से ही जीत पाए।
टंडन के त्यागपत्र से लखनऊ पश्चिम की खाली हुई विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा के अमित पुरी हार गए और कांग्रेस के श्याम किशोर शुक्ल जीत गए।
भाजपा नेता हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे और विधानसभा के चुनाव में अटल के गढ़ पर विधानसभा के नौ क्षेत्रों में समाजवादी झंडा फहर गया।
वहीं एक सीट पर बसपा और एक पर भाजपा जीती। खास बात यह रही है कि लखनऊ शहर की छह सीटों में चार ब्राह्मण चेहरे जीते।
इनमें भाजपा के कलराज मिश्र, कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी और सपा के दो चेहरे शारदा प्रताप शुक्ल व अब लोकसभा प्रत्याशी हो चुके अभिषेक मिश्र शामिल हैं।
इससे स्पष्ट है कि लखनऊ का ब्राह्मण अब भाजपा के बजाय प्रत्याशी देखकर वोट करने लगा है।
इस बार भाजपा में टिकटों को लेकर जिस तरह का झगड़ा हुआ है, उससे इस शहर का भाजपा समर्थक मतदाता भी कम दुखी नजर नहीं आता। यह दुख राजधानी में नए समीकरण बना सकता है।