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UP: मॉडल बताएगा...कितने दिन का कितना शोर बना देगा बहरा, टैक्सी चालकों पर किया गया अध्ययन; देश में ऐसा पहला शोध

Tue, 16 Apr 2024 09:11 AM IST
शाहरुख खान सचिन त्रिपाठी, अमर उजाला, लखनऊ

सार

केजीएमयू के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग ने शोर पर आधारित मॉडल तैयार किया है। यह मॉडल बताएगा कि कितने दिन का कितना शोर बहरा बना देगा। देश में इस तरह के पहले अध्ययन को प्रसिद्ध जर्नल नेचर में मान्यता दी गई है।
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kgmu research - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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यातायात, डीजे और फैक्टरी का शोर डेसिबल में मापा जा सकता है। गलतफहमी यह है कि भारी शोर बंद होने पर सब सामान्य हो जाता है, लेकिन वास्तविकता में व्यक्ति के पूरे जीवन काल में निर्धारित शोर सहने की सीमा होती है। इसके बाद वह बहरा हो सकता है। 
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किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग ने शोर पर आधारित मॉडल तैयार किया गया है, जो यह बता सकता है कि कितने दिनों तक कितना शोर आपको बहरा बना सकता है।

स्टेटिकल एस्टीमेशन ऑफ न्वॉइज इंड्यूज्ड हियरिंग लॉस अमंग द ड्राइवर्स इन वन ऑफ द मोस्ट पॉल्युटेड सिटीज इन इंडिया, के नाम से यह अध्ययन प्रसिद्ध जर्नल नेचर में प्रकाशित हुआ है। यह मॉडल डॉ. मनीश कुमार मनार, डॉ. शिवेंद्र सिंह, डॉ. प्रशांत बाजपेयी, डॉ. वीरेंद्र वर्मा, डॉ. एस. प्रसाद शुक्ला, डॉ. नीरज कुमार सिंह और डॉ. मार्कंडेय ने तैयार किया है। 
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इसके माध्यम से व्यक्ति शोर में रहने की अवधि और उसके स्तर का आकलन कर यह पता कर सकता है कि वह कितने दिन सुरक्षित है। इसके बाद कितने दिन का शोर उसे बहरा बना देगा।
 

121 डेसिबल तक सुरक्षित, 133 से ज्यादा शोर बनाएगा बहरा
डॉ. मनीश कुमार मनार ने बताया कि मॉडल तैयार करने से पहले ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. वीरेंद्र कुमार वर्मा के साथ गंभीर चर्चा की गई। उन्होंने बताया कि कान में अंदर की तरफ होने वाले बाल जन्म के बाद दोबारा नहीं उगते। शोर के स्तर के आधार पर इनमें कंपन होता है। हर बार का शोर इनको कुछ न कुछ नुकसान पहुंचाता है। चूंकि ये बाल दोबारा नहीं उगते, इसलिए व्यक्ति के पूरे जीवनकाल में शोर झेलने का एक स्तर होता है। इस अध्ययन में उसे मापा गया। इसमें देखा गया कि 121 डेबिल प्रति घंटे का संचयी शोर व्यक्ति आसानी से झेल सकता है। इससे उसकी सुनने की क्षमता को कोई नुकसान नहीं पहुंचता। वहीं, 133 डेसिबल प्रति घंटे का शोर होने पर व्यक्ति के सौ फीसदी बहरे होने की आशंका होती है।
 

दोस्त की समस्या के बाद आया मॉडल विकसित करने का ख्याल
डॉ. मनार ने बताया कि उनका एक दोस्त जम्मू कश्मीर में माइनिंग में काम कर रहा है। लगातार शोर में रहने की वजह से उसे कान में दर्द रहता था। उसने यह सवाल किया इतने शोर में वह कितने समय तक बिना बहरा हुए काम कर सकता है। इसके बाद जब इस बारे में सर्च किया तो पता चला कि इस तरह का सिर्फ एक अध्ययन चीन में हुआ था। देश में इस पर बड़े स्तर का कोई शोध नहीं किया गया। इसके बाद करीब डेढ़ साल की मेहनत के बाद यह मॉडल तैयार हो पाया।

टैक्सी चालकों पर किया गया अध्ययन
इस अध्ययन में टैक्सी चालकों को आधार बनाया गया, क्योंकि वे लगातार शोर में रहते हैं। इसके लिए तीन अलग रूट के कुल 150 ड्राइवर अध्ययन में शामिल किए गए। इसी के साथ ही बंद कार चलाने वाले 150 ड्राइवरों को लिया गया।

औसतन शोर का स्तर डेसिबल में
घर पर
बच्चे का रोना- 110, मिक्सी- 90, डोरबेल- 80, वैक्यूम क्लीनर- 60 से 85, फ्रिज-50।

कार्य स्थल
पांच सौ फीट पर आर्टिलरी फायर-150, एयरोप्लेन टेकिंग ऑफ-140, एंबुलेंस सायरन- 120, क्लब-110, इलेक्ट्रिक ड्रिल-95, सामान्य ऑफिस लाइब्रेरी- 40।

 
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अन्य
हैंडगन- 166, रायफल-163, पटाखे-150, डीजे-120, हेवी ट्रैफिक 85, रेजिडेंशियल एरिया- 40।
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