विधान परिषद की स्थानीय प्राधिकारी कोटे की 36 सीटों के चुनाव नतीजे सियासी दलों की साख के लिए सवाल बन गए हैं। वैसे तो आमतौर पर इनके नतीजे सत्तारूढ़ दल के अनुकूल रहते हैं।
बावजूद इसके इस चुनाव के दौरान जिलों में बनने व बिगड़ने वाले समीकरणों से सियासी दलों की पकड़ का संकेत जरूर मिल जाता है। फिर इस बार स्थिति भी बदली हुई है। इसलिए सभी की कोशिश होगी कि इन चुनाव के सहारे वे सूबे में अपनी मजबूती का संदेश देने में पीछे न रहें।
पिछली बार जनवरी 2010 में जब इन सीटों के चुनाव हुए थे तब प्रदेश विधानसभा चुनाव में लगभग दो साल का वक्त बचा था। इस बार इन सीटों के चुनाव और विधानसभा चुनाव के बीच एक साल का ही वक्त बचा है।
राजनीतिक समीक्षकों का मानना है कि मतदाताओं की संख्या कम होने के कारण भले ही सत्तापक्ष की तरफ से जोर-जबरदस्ती से मतदान को प्रभावित करने की कोशिश की जाए। बावजूद इसके इस चुनाव के दौरान उभरने वाले सियासी समीकरणों के संकेतों पर आसानी से परदा नहीं डाला जा सकेगा।