कर्नाटक को दक्षिणी राज्यों का प्रवेश द्वार कहा जाता है। देश के ज्यादातर हिस्सों में सत्तारूढ़ दल की हैसियत बना चुकी भाजपा के रणनीतिकारों का लक्ष्य राष्ट्रव्यापी विस्तार है।
कांग्रेस मुक्त नारे के साथ 2013 में भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति का नेतृत्व संभालने मैदान में उतरे नरेंद्र मोदी और पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह लगातार उत्तर से दक्षिण तक भाजपा के विस्तार की बात कहते रहे हैं। इसीलिए कर्नाटक में जीत के लिए पार्टी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती।
वैसे तो पहले भी कर्नाटक में भाजपा सत्ता में रह चुकी है, पर लगता है कि मोदी और शाह के दिमाग में कहीं न कहीं कर्नाटक के साथ भविष्य में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना तथा तमिलनाडु के समीकरण एवं चुनौतियां भी उथल-पुथल मचा रही हैं।
केरल के चुनाव में अभी लंबा वक्त है, लेकिन आंध्र प्रदेश व तेलंगाना में विधानसभा चुनाव 2019 में ही प्रस्तावित हैं। ऐसे में भगवा टोली के रणनीतिकारों की कोशिश है कि कर्नाटक में भाजपा को सत्ता में लाकर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में चुनावी समर की चुनौतियों से निपटने की जमीन बना ली जाए।
साथ ही केरल में भी ठीक से पैर जमाए जा सकें। इसीलिए कर्नाटक जीत के लिए भाजपा हरसंभव कोशिश कर रही है, जिससे लोकसभा चुनाव में भी लाभ मिल सके।
नाथ संप्रदाय के प्रमुख केंद्र गोरक्षपीठ का यूपी के गोरखपुर में होना कर्नाटक और यूपी के समीकरणों को जोड़ता ही है। इसके अलावा एक और वजह से भी भगवा टोली की कोशिश कर्नाटक में यूपी वालों को जुटाने की नजर आती है।
यह वजह धार्मिक या सांस्कृतिक सरोकारों से इतर व्यावसायिक व शैक्षिक भी है। उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों के तमाम लोग कर्नाटक में रह रहे हैं। कुछ तो वहीं बस गए हैं। इसलिए यूपी के लोगों के जरिये भाजपा इन्हें लामबंद करना चाहती है।