लखनऊ। लखनऊ मेट्रो के ईस्ट-वेस्ट कॉरिडोर (चारबाग से बसंतकुंज) पर बिना ड्राइवरों वाली ट्रेनें दौड़ेंगी। कंट्रोल सिस्टम से इनका संचालन होगा, जिससे इससे सुरक्षा और पुख्ता होगी। मेट्रो प्रशासन ने शुक्रवार को 15 ड्राइवरलेस ट्रेन सेट और सिग्ननलिंग सिस्टम के डिजाइन और निर्माण के लिए टेंडर जारी किया।
मेट्रो के जनसंपर्क विभाग ने बताया कि ट्रेनों को इस तरह तैयार किया जाएगा कि इनमें तेज रफ्तार, बेहतर सुरक्षा के साथ यात्रियों को ज्यादा आराम मिले। इनका संचालन अनअटेंडेड ट्रेन ऑपरेशन (यूटीओ) मोड पर होगा। यह ड्राइवरलेस प्रणाली है, जिसमें ट्रेनें कम्युनिकेशन-बेस्ड ट्रेन कंट्रोल (सीबीटीसी) जैसी उन्नत तकनीक की मदद से खुद चलती, रुकती व गति नियंत्रित करती हैं। इसमें ट्रेनें लगातार ऑपरेशंस कंट्रोल सेंटर के संपर्क में रहती है, जो उसकी गतिविधियों की निगरानी करने के साथ सुरक्षा सुनिश्चित करता है। यह प्रणाली अन्य ट्रेनों से सुरक्षित दूरी बनाए रखती है और किसी समस्या की स्थिति में स्वतः ब्रेक लगा सकती है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से ट्रेनों की मेंटेनेंस होगी। इससे कोई भी गड़बड़ी तत्काल पता लग सकेगी।
सीओ2 स्तर से तय होगी एसी कूलिंग
मेट्रो कोच के अंदर लगी इंफोटेनमेंट स्क्रीन पर लाइव स्ट्रीमिंग की सुविधा मिलेगी, जो ऑपरेशन कंट्रोल सेंटर से नियंत्रित होगी। यात्रियों के आराम को ध्यान में रखते हुए ट्रेनों में सीओ2 सेंसर आधारित सिस्टम लगाया जाएगा। यह कोच के अंदर एसी की कूलिंग तय करेगा। बोगियों में इमरजेंसी इंटरकॅाम भी होगा। जिस कोच से कॉल की जाएगी, उसकी लाइव फुटेज ड्राइवर केबिन, ऑपरेशन कंट्रोल रूम और सिक्योरिटी कंट्रोल रूम में दिखाई देगी। ट्रेन के अगले स्टेशन पर पहुंचते ही सुरक्षा टीम मदद के लिए मौजूद रहेगी।
5801 करोड़ रुपये से पूरा होगा प्रोजेक्ट
12 किमी लंबे लखनऊ मेट्रो के दूसरे चरण के प्रोजेक्ट की कुल लागत 5801 करोड़ रुपये है। 150 करोड़ रुपये से बसंतकुंज में डिपो बनाया जाएगा। इसके लिए टेंडर जारी होने से पहले एलिवेटेड स्टेशनों के निर्माण का टेंडर हो चुका है। पांच एलिवेटेड स्टेशन बनने हैं, जिनका काम दो महीने में शुरू हो जाएगा। सात अंडरग्राउंड स्टेशन बनाने के लिए भी टेंडर जारी होंगे। प्रोजेक्ट पांच वर्ष में पूरा होगा।
Iईस्ट-वेस्ट कॉरिडोर पर चलने वाली ट्रेनें भी सुरक्षा और ऊर्जा बचत में विश्वसनीय और बेहतर होंगी। ड्राइवरलेस ट्रेनों से गलतियों की गुंजाइश कम हो जाएगी। I
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- सुशील कुमार, एमडी, मेट्रोI