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करवा चौथः ये पति आज जिंदा हैं तो अपनी पत्नी की वजह से

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जब ठान ही लिया कि अपनी ‘जिंदगी’ की जिंदगी बचानी है तो फिर चुनौतियां कैसी और खतरे कैसे? सुहाग बचाने के लिए हर मुश्किल के सामने डंटीं रहीं। इस करवाचौथ पर ऐसी ही सुहागिनों की बात जिन्होंने पति की किडनी खराब होने के बावजूद हार नहीं मानी, अपनी किडनी देने पर अड़ गईं।
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खून मैच नहीं हुआ तो रिश्तेदारों ने मना किया... डॉक्टरों ने समझाया... खतरे से आगाह भी किया... पर उनके अटूट प्रेम और जिंदगी बचाने की जिद के सामने सभी झुकते गए। इस बीच, मेडिकल साइंस भी आगे बढ़ गया।

अलग-अलग ग्रुप का खून होने पर भी किडनी ड्रांसप्लांट होने लगे। पीजीआई में भी 2013 से ही ऐसे ट्रांसप्लांट शुरू हो गए। तब कई सुहागिनों ने पति को किडनी दी। अब उनकी किडनी पति की जिंदगी बन चुकी है।
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ऐसी ही सुहागिनें ‘नई जिंदगी’ के बाद पहला करवाचौथ मनाएंगी। इनमें से एक अर्चना कुमार का करवाचौथ तो पीजीआई में ही मनेगा। ऐसी ही सुहागिनों पर खास रिपोर्ट...

उनकी जिंदगी बचा पाई, यही मेरा सबसे बड़ा सुख

मरीज- अरविंद कुमार (48, पति)
दानदाता- अर्चना कुमार (42, पत्नी)
निवासी- एलडीए कॉलोनी, कानपुर रोड
किडनी दान- 6 अक्तूबर 2015

जिंदगी का दान : समाज कल्याण निर्माण निगम में इंजीनियर अरविंद कुमार को 2012 में पता चला कि उनकी किडनी खराब हो चुकी है। दिसंबर 2012 में उन्हें एसजीपीजीआई में एडमिट कराना पड़ा। कुछ महीने दवाइयों से काम चला। 2013 के अंत में पीजीआई के डॉ. नारायण प्रसाद ने उन्हें ट्रांसप्लांट का सुझाव दिया। किडनी दान करने की बात आई तो अंतिम विकल्प पत्नी अर्चना ही थीं, लेकिन ब्लड ग्रुप मैच नहीं होने की वजह से डॉक्टरों ने मना कर दिया।

इस बीच अरविंद को हेपेटाइटिस सी का संक्रमण हो गया। दिल्ली में इलाज से इसे नियंत्रित करने में पूरा साल निकल गया। अर्चना कहती हैं, पति को डिप्रेशन में देख मेरा डर खत्म हो गया था। मेरे बच्चों हर्ष और हर्षित की जिंदगी भी इससे जुड़ी थी।

इस बीच पीजीआई में दूसरे ब्लड ग्रुप की किडनी का ट्रांसप्लांट शुरू हो गया था। दुबारा डॉक्टर से मिली और किडनी ट्रांसप्लांट कराने की बात कही। डॉक्टर मेरी किडनी ट्रांसप्लांट करने के लिए राजी हो गए। पति की तबीयत में सुधार है। उनकी जिंदगी बचा पाई, यही मेरा सबसे बड़ा सुख है।

संदेश : पति की किडनी के लिए कोलकाता से लेकर दिल्ली तक प्रयास किए। तीन साल में हर दिन दर्द में कटा। मेरा फैसला अपने परिवार को बचाने के लिए था।

पत्नी अड़ी तो खुलते चले गए सभी बंद रास्ते

मरीज- जुम्मन अली (42, पति)
दानदाता- मुनीरा खातून (36, पत्नी)
किडनी दान- 11 मई 2015

जिंदगी का दान : ब्लड ग्रुप ओ पॉजिटिव होने की वजह से जुम्मन अली को परिवार के किसी भी सदस्य से किडनी नहीं मिल पा रही थी। 2010 से वह लगातार डायलिसिस के सहारे थे। एबी पॉजिटिव ब्लड ग्रुप के करण पत्नी मुनीरा खातून को भी डॉक्टरों ने मना कर दिया, लेकिन वे भी अड़ गईं।

आखिरकार 2014 में डॉक्टर मान गए। अब दिक्कत इसमें आने वाले खर्च की थी। पति की किराना की दुकान पहले ही बंद हो चुकी थी। इलाज के  लिए पीजीआई प्रशासन ने कामधेनु पेशेंट रिलीफ फंड से 12.5 लाख रुपये दिए, वहीं मुख्यमंत्री कोष से भी पांच लाख रुपये की मदद मिल गई।

मुनीरा का कहना है कि रिश्तेदार शुरू में डराते थे कि तुम्हारी जिंदगी को खतरा हो सकता है। बेटियों निशा और नाजमीन का क्या होगा? मैं नहीं मानी और किडनी दान की।

संदेश : किडनी दान करने के बाद मुझे कोई समस्या नहीं है। मैं सामान्य जिंदगी जी रही हूं। हां, अभी पति का जरूर ध्यान रखना पड़ता है।

दुख में कभी न छूटे एक-दूजे का साथ

मरीज : दिनेश मिश्रा (पति, उम्र 52 वर्ष)
दानदाता : साधना मिश्रा (पत्नी, उम्र 47 वर्ष )
किडनी दान: 12 जुलाई 2015

जिंदगी का दान : यूपी पुलिस में इंस्पेक्टर दिनेश मिश्रा को करीब दो साल से किडनी की समस्या थी। अपनी जॉब के बीच इससे जूझते हुए उन्हें डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर की समस्या भी हो गई। इसी दौरान पैरों में सूजन के बाद हुई जांच के आधार पर चिकित्सकों ने बताया कि उनकी दोनों किडनियां फेल हो गई हैं।

ऐसे में उनकी पत्नी साधना आगे आईं और अपनी एक किडनी देने की बात कही। दिनेश कहते हैं, अगर साधना समय पर आगे नहीं आई होतीं तो शायद वे डायलिसिस की परेशानियां झेलने को मजबूर होते।

दूसरी ओर, साधना कहती हैं कि भारतीय समाज पति-पत्नी के इसी समर्पण पर आधारित हैं, इसलिए वे इसे कोई बहुत बड़ा त्याग नहीं मानतीं। वे कहती हैं कि विवाह के 30 वर्ष हो चुके हैं और आज उन्हें लगता है कि विवाह महज संस्कार नहीं, बल्कि दो आत्माओं का मिलन है, जिसमें एक की कल्पना दूसरे के बिना नहीं की जा सकती।

संदेश : पत्नी और पति शायद कभी सुख में साथ न हों, लेकिन दुख में दोनों को एक-दूसरे का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
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सोच लिया था, मौत भी आएगी तो साथ आएगी

मरीज : सुरेश वर्मा (पति, उम्र 36 वर्ष)
दानदाता : ज्योति वर्मा  (पत्नी, उम्र 32 वर्ष )
किडनी दान: 19 मार्च 2015

जिंदगी का दान : उस वक्त शेयर कारोबारी सुरेश के पैरों तले जमीन खिसक गई जब डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि उनकी दोनों किडनियां फेल हो चुकी हैं। सुरेश बताते हैं कि उन्हें कमजोरी थी। विवेकानंद अस्पताल में जांच करवाई तो रिपोर्ट में यह कड़वा सच सामने आया।

उनकी मां कमला वर्मा ने अपनी एक किडनी देनी चाही, लेकिन चिकित्सकीय जांच में सामने आया कि उन्हें शुगर है और वे किडनी दान नहीं कर सकेंगी। ऐसे में पत्नी ज्योति ने किडनी देने के लिए आगे आईं।

ज्योति के अनुसार कई लोगों ने उनसे कहा कि वे युवा हैं और ऐसा करना उनके जीवन के लिए सही नहीं होगा। यहां तक कि खुद पति ने भी उन्हें किडनी दान करने से मना कर दिया लेकिन ज्योति नहीं मानीं। उन्होंने तय किया कि ‘जो होगा साथ देख लेंगे। मौत भी आएगी तो साथ आएगी।’ उनका यह साहस ही था जिसने उनके पति के प्राणों की रक्षा की।

संदेश  : सुरेश कहते हैं, पति-पत्नी का एक-दूसरे के प्रति समर्पण का भाव ही हमारे समाज को मजबूत बनाता है। हर हाल में इसे कायम रखना चाहिए।
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