वह चार बार प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। सियासत में सामाजिक इंजीनियरिंग के सफल प्रयोग के जरिये पूरी ताकत से पांच साल तक देश के सबसे बड़े प्रदेश में निर्विघ्न राज किया है। वह अपने विरोधियों पर बेहद तीखे वार करती हैं।
अंबेडकर के नाम पर सियासत करने वाली दलित की इस बेटी को उनके विरोधी दौलत की देवी बताकर तंज कसते हैं, लेकिन इस दलित नेत्री ने दलितों और वंचित समाज के न जाने कितने जाने-अनजाने चेहरों को दुबारा पहचान दिला दी।
प्रदेश की राजधानी लखनऊ और देश की राजधानी के करीब नोएडा में दलित उत्थान में योगदान करने वाले तमाम सामाजिक क्षत्रपों की मूर्तियां इतिहास के पन्नों से निकलकर 21वीं सदी में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं।
मूर्तियों और स्मारकों के निर्माण में बड़े पैमाने पर हुए भ्रष्टाचार की वजह से ही उन्हें अपनी सत्ता भी गंवानी पड़ी। उनके कार्यकाल में ताकतवर माने जाने वाले कई मंत्री आज भी जेल की काल कोठरी में अपने दिन गिन रहे हैं। लेकिन अपने कार्यकाल के तमाम विवादों और आरोपों को दरकिनार कर वह खुद पांचवीं बार प्रदेश के मुख्यमंत्री की गद्दी पर अपना दावा ठोकने को तैयार हैं।
15 जनवरी को भरेंगी हुंकार
यह भी बेहद दिलचस्प है कि अपने जन्मदिन की भव्यता और उससे ही जुड़े एक हत्याकांड के विवाद के बावजूद मुख्यमंत्री की अगली दौड़ के अहम एलान के लिए भी उन्होंने उसी दिन को चुना है।
15 जनवरी को एक बार फिर बसपा के कार्यकर्ता लखनऊ में अपनी नेता मायावती का जन्मदिन जोरदार तरीके से मनाने की तैयारीकर चुके हैं। जन्मदिन के इसी मंच से पार्टी सुप्रीमो 2017 के जंग का हुंकार भरने वाली हैं।
विरोधाभास तो जैसे मायावती के जीवन का पर्याय है। पांचवीं बार मुख्यमंत्री बनने के लिए जिस समाजवादी पार्टी से उनका कड़ा मुकाबला संभावित है, उसी के साथ मिलकर उन्होंने 1993 में पहली बार यूपी की सरकार बनाई थी। देश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री का खिताब भी उन्हीं के नाम दर्ज है।
अपने कार्यकर्ताओं के बीच बहनजी कही जाने वाली मायावती को आयरन लेडी भी कहा गया। अब इस आयरन लेडी ने यूपी की रेस में कूदने से पहले ही एलान कर दिया है कि वह इस बार मूर्तियों और स्मारकों के चक्कर में नहीं रहने वाली।
इन मुद्दों पर होगी असली कसौटी
उनका एजेंडा यूपी का विकास है। विकास की बात भाजपा भी करती है। प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री अखिलेश भी विकास के अपने काम के नाम पर ही दूसरी बार जनादेश चाहते हैं।
यूपी की जनता को विकास की दुहाई देने वाले इन्हीं क्षत्रपों में से एक को अपना रहनुमा चुनना है। यह बात और है कि इनकी असली परीक्षा इनके जातीय आधार की जमीनी सच्चाई की कसौटी पर ही होगी।
मायावती ने सिर्फ मूर्तियों और स्मारकों से ही तौबा करने की बात नहीं कही है। केवल दलितों के लिए लड़ने और मरने का दम भरने वाली बसपा सुप्रीमो ने सर्वसमाज की बात शुरू कर दी है।
2007 के चुनाव में मुसलमानों के साथ प्रदेश के तकरीबन 10 फीसदी ब्राह्मणों ने उन्हें सत्ता की बेहद मजबूत गद्दी पर बैठा दिया था। वह इतिहास दोहराना चाहती हैं, लेकिन चुनावी सियासत में जातियों की जंग के रंग एक जैसे नहीं होते।
ये होंगी प्रमुख चुनौतियां
जातियों के मोहपाश से सियासत का छुटकारा तो फिलहाल कैसे मुमकिन होगा? लेकिन बसपा सत्ता पाने के लिए ऊपरी तौर पर ही सही, सर्वसमाज के नारे को हवा दे रही है।
यह इसलिए भी कि शायद ब्राह्मणों का साथ उसे उस तरह नहीं मिले जैसा 2007 में मिला था। या फिर इसलिए कि मुसलमान वोटरों के रुख का कुछ तय नहीं।
सपा शासनकाल में दलितों के साथ भेदभाव और प्रमोशन में आरक्षण को समाप्त कर डिमोशन भी बसपा के लिए आने वाले चुनाव में बड़ा मुद्दा होगा।
वैसे जातीय ताकत के साथ मायावती अपनी पार्टी और सरकार में सख्त अनुशासन के लिए भी जानी जाती हैं। उनके कार्यकाल में भ्रष्टाचार से पीड़ित लोग उनके कठोर अनुशासन की आज भी दाद देते मिल जाते हैं, वहीं इसके शिकार हुए नेता-अफसर उसे बुरे वक्त के रूप में याद करते हैं।
खैर अब 2017 में जनता की अदालत में नेताओं और यूपी के सभी सियासी चेहरों को ट्रायल से तो गुजरना ही होगा?