लोकसभा चुनाव के पहले बसपा की राजधानी में हुई ‘सावधान महारैली’ से बसपा सुप्रीमो मायावती का निश्चित रूप से भरोसा बढ़ा होगा।
हालांकि उनके क्षत्रपों को सावधान हो जाने के संकेत भी इस रैली ने दे दिए हैं।
इन संकेतों का संदेश साफ है दलित तो उनकी संगठन सुप्रीमो मायावती के साथ भरोसे के साथ खड़ा है परंतु वे जिन लोगों के बीच से आते हैं, वहां उनको लेकर भरोसा कुछ कम हुआ है।
समय रहते ये क्षत्रप न चेते तो बसपा के भीतर उनकी जमीन भी कुछ खिसक सकती है।
इससे पहले मायावती ने कहा था कि तमाम मुश्किलों के बावजूद दलित उनके साथ एकजुट रहा लेकिन ब्राह्मण समाज गुमराह हो गया जिसकी वजह से बसपा को सत्ता से बेदखल होना पड़ा।
इसके छह महीने से अधिक समय बाद हुई ‘सावधान रैली’ में भी मायावती का निष्कर्ष उसी के इर्द-गिर्द रहा।
रैली में बड़ी संख्या में दलितों की मौजूदगी से जहां वे उत्साहित दिखीं, वहीं पिछड़ों और मुसलमानों के पार्टी से जुड़ाव को लेकर उनके चेहरे पर चिंता की रेखाएं भी दिखीं।
इसका प्रमाण मायावती के ताजे फैसले भी हैं। मायावती ने अब जिलों के संगठनों में सभी जातियों की संतुलित भागीदारी का निर्णय किया है।
उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि अब वे अपना पूरा जोर पिछड़ों और मुस्लिमों के साथ केंद्र व प्रदेश सरकार से नाराज सवर्ण समाज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि) को पार्टी से जोड़ने पर लगाएंगी।
साफ है कि मायावती ने नसीमुद्दीन सिद्दीकी, सतीशचंद्र मिश्र और स्वामी प्रसाद मौर्य को संकेतों में समझा दिया है कि उन्हें अपने वर्गों के बीच अभी कड़ी मेहनत की जरूरत है।