सपा एमएलसी स्वामी प्रसाद मौर्य के सुर बदल गए हैं। बुधवार को मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि देश की समस्त महिलाओं एवं दलितों को अपमानित करने वाली रामचरित मानस की पंक्तियों का विरोध कर रहे हैं। उनकी बात को धर्म से जोड़ना गलत है। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी बात को कुछ लोग तोड़ मरोड़ कर पेश कर रहे हैं। उन्होंने इस संबंध में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र भेजा है।
टीवी चैनल से बातचीत करते हुए स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि उनकी बात को कुछ लोग श्रीराम से जोड़ते हैं। देश में बहुत से लोगों के श्रीराम आराध्य हैं। मैंने कभी भी उनके बारे में कुछ नहीं कहा है। उन्होंने कहा कि वह सिर्फ चंद चौपाई पर आपत्ति जता रहे हैं, जिसमें दलितों एवं महिलाओं को अपमानित करने वाले शब्द हैं। प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति को लिखे गए पत्र के बारे में उन्होंने कहा कि पत्र सिर्फ इसलिए लिखा कि लोगों को अपमानित होने से बचाया जाए।
भारतीय संविधान के लागू होने के बाद सभी धर्म एक समान है। उन्होंने राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री को भेजे पत्र में लिखा है कि कुछ चैपाइयों में वर्ग विशेष की श्रेष्ठता स्थापित की गई है और शूद्रों को अपमानित किया गया है। संविधान का हवाला देते हुए लिखा है कि जितनी जल्दी हो सके इस विरोधाभास को समाप्त करना होगा। उन्होंने संविधान के विभिन्न अनुच्छेद और डा. भीमराव अंबेडकर के भाषण के हवाले से कहा है कि हमारा संविधान भारत की सर्वोपरि किताब है। कोई धार्मिक किताब भी संविधान से ऊपर नहीं हो सकती। पत्र में विभिन्न धर्मग्रंथों का जिक्र भी किया है। लखनऊ का नाम बदलने के सवाल पर उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार अपनी असफलता पर पर्दा डालने के लिए इस प्रकार का हट्ठखंडा अपना रही है।