मुस्लिमों में तगड़ी पकड़ रखने वाले और सपा के कद्दावर नेता आजम खां की विधानसभा की सदस्यता तो गई ही, साथ ही वे आगे छह साल तक चुनाव भी नहीं लड़ सकेंगे। गर्दिश के दौर से गुजर रहे आजम के सामने यह बड़ी चुनौती होगी कि वह अगले चुनाव तक क्या इसी पुराने अंदाज में अपनी वापसी कर पाएंगे। बढ़ती उम्र, गिरती सेहत और मुकदमों की भरमार के चलते आजम क्या इसी तरह से चुनावी रण में हुंकार भर सकेंगे। उनका प्रभाव पश्चिमी उप्र की कई सीटों पर रहा है और निकाय चुनाव की तैयारियों में लगी सपा के लिए यह करारा झटका माना जा रहा है।
विधानसभा चुनाव 2022 की बात करें तो सपा तमाम प्रयासों के बावजूद सत्ता के शिखर तक नहीं पहुंच पाई। बावजूद इसके पश्चिमी उप्र की कई सीटों पर उसने अच्छा प्रदर्शन किया। रामपुर व आसपास के जिलों में सपा ने कई सीटें जीतीं। माना गया कि आजम खां की सियासत ने इस क्षेत्र में खास तौर पर सपा को बढ़त दिलाई। रामपुर जिले की ही पांच सीटों में से तीन सपा ने जीती। आजम खां और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम दोनों ही चुनाव जीते। उधर निकट के मुरादाबाद जिले में भी पांच सीटें सपा ने जीत लीं। मात्र एक सीट पर भाजपा ने विजय पताका पहराई। संभल में भी चार में से तीन सीटें सपा ने जीतीं। कुल मिलाकर पश्चिमी उप्र में सपा रालोद गठबंधन मिलकर 40 से ज्यादा सीटें जीता था।
इस समय आजम खां की विधायकी चली गई है। यह उनके लिए बड़ी चुनौती है। सदन में उनकी गैर मौजूदगी तो सपा को कमजोर करेगी ही, साथ साथ अगले छह साल तक चुनावी समर में न उतरने के कारण आजम खां सीधा वोटरों तक अपनी पहुंच नहीं बना सकेंगे। छह साल बाद उनकी उम्र लगभग 80 साल हो जाएगी। उनकी सेहत भी गिर रही है। साथ ही अदालत में चल रहे तमाम केसों की सुनवाई क्या उन्हें इतने लंबे समय तक सियासी रण में मजबूती से खड़ा रख पाएगी। हालांकि उनके पुत्र अब्दुल्ला इस भरपाई को पूरा करने की कोशिश करेंगे लेकिन यह आसान नहीं होगा।
निकाय चुनाव में सपा करेगी लाभ उठाने की कोशिश
आजम खां पर लगे इस प्रतिबंध का सपा लाभ पूरा भावनात्मक लाभ उठाने की कोशिश कर सकती है। चूंकि सपा बार बार कहती रही है कि सरकार उसके खिलाफ बदले की भावना से कार्रवाई कर रही है और फर्जी मुकदमे लगाए गए हैं। हालांकि आजम को सजा अदालत ने दी है और नियमानुसार उनकी विधायकी गई है। सजा भी भड़काऊ भाषण देने के मामले में मिली है पर इसका भावनात्मक लाभ लेने की सपा पुरजोर कोशिश कर सकती है। खास तौर से जिस तरह बसपा फिर से मुस्लिम वोटरों को लुभाने की कोशिश कर रही है और सपा के लिए यह चिंता है तो इस चिंता का समाधान यह रोक भी हो सकती है। निकाय चुनाव में इसका असर साफ देखने को मिलेगा।
‘नेताजी’ के बाद लगातार झटके
सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद सपा को लगातार झटके लग रहे हैं। पहले इमरान मसूद पार्टी छोड़कर बसपा में चले गए तो इसके बाद अब आजम खां को अदालत ने सजा सुनाई है। माना जा रहा है कि सपा की आगे की राह काफी मुश्किल भरी रहने वाली है। सपा का प्रबंधन इससे काफी कमजोर हो सकता है।
पहले पुत्र अब पिता की गई विधायकी
आजम खां और अब्दुल्ला आजम दोनों एकमात्र ऐसे पिता पुत्र हैं जिनकी दोनों की विधानसभा सदस्यता रद्द की गई है। कम उम्र्र में चुनाव लड़ने और फर्जी दस्तावेज लगाने के कारण अब्दुल्ला आजम की विधायकी चली गई थी। हालांकि वे बाद में फिर से स्वार सीट से लड़कर चुनाव जीते।