दिसंबर 2019 में जब सीएए व एनआरसी को लेकर प्रदर्शन हो रहा था, उस समय सबकुछ पहले से जानकारी होने के बाद भी कई घंटे तक राजधानी की सड़कों पर दंगाई उपद्रव करते रहे। उस समय लखनऊ में पुलिस आयुक्त प्रणली लागू नहीं थी। लखनऊ में हुई हिंसा को नियंत्रित करने के लिए पूरा डीजीपी कार्यालय लखनऊ की सड़कों पर उतार दिया गया था। पहली बार किसी हिंसा को रोकने के लिए खुद तत्कालीन डीजीपी ओम प्रकाश सिंह, तत्कालीन एडीजी कानून व्यवस्था पीवी रामाशास्त्री और लगभग एक दर्जन एडीजी व आईजी रैंक के अफसरों को उतारना पड़ा था।
वहीं सूत्रों का कहना है कि इस मामले में बिल्कुल निचले स्तर पर लापरवाही देखने को मिली। चौकी इंचार्ज से लेकर सीओ तक मौके की नजाकत नहीं भांप सके। विरोध प्रदर्शन की काल वापस होने केबाद भी लोग प्रदर्शन के लिए उतर आएंगे, इसके बारे में जानकारी नहीं जुटा सके। यहां तक कि कितनी फोर्स की जरूरत पड़ेगी, किन प्वाइंट पर ड्यूटियां लगाई जाएंगी, इसकी भी कोई तैयारी नहीं की गई, जिसकी वजह से जुमे की नमाज के बाद लोग सड़कों पर उतर आए, दुकानें बंद करवाने लगे और फिर पथराव शुरू कर दिया। अब इनकी जवाबदेही तय की जाएगी। इसकी रिपोर्ट शासन को मिल गई है। शुक्रवार देर शाम तक लापरवाही बरतने वाले पुलिस अधिकारियों व कर्मियों पर कार्रवाई तय मानी जा रही है।
पुलिस कमिश्नरेट सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा कानपुर में देखने को मिला जहां पुलिस आयुक्त स्तर का अधिकारी 10 मिनट के अंदर पहुंच गए। पुलिस कमिश्नरेट में आफिसर ओरिएंटेड पुलिसिंग होती है। दरोगा या इंस्पेक्टर के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। कानपुर में अगर कमिश्नरेट के वरिष्ठ अधिकारी तत्काल मौके पर पहुंचे होते तो स्थिति को नियंत्रित करने में समय लगता। - प्रशांत कुमार, अपर पुलिस महानिदेशक, कानून व्यवस्था