उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में सूचीबद्ध मामलों की भारी संख्या के कारण एक न्यायाधीश ने एक मामले में निर्णय लिखाने में असमर्थता जताई। उन्होंने कहा कि वह भूखे, थके और शारीरिक रूप से फैसला लिखाने की स्थिति में नहीं हैं। इसलिए, आदेश सुरक्षित रखा जाता है।
यह याचिका वर्ष 2025 में ऋण वसूली अधिकरण (डीआरटी) के एक आदेश के खिलाफ दायर की गई थी। मई 2025 में हाईकोर्ट ने डीआरटी का आदेश निरस्त कर दोबारा सुनवाई को भेजा था। याची को सुनवाई का अवसर देने का निर्देश था। इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
25 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए आदेश रद्द कर दिया था कि संबंधित पक्ष को सुनवाई का अवसर नहीं मिला। हाईकोर्ट को निर्देश दिया गया था कि याचिका में शीघ्र, संभव हो तो छह माह में निर्णय दिया जाए। यह अवधि 24 फरवरी 2026 को पूरी हो रही थी।
अब 24 फरवरी यानी मंगलवार को न्यायमूर्ति विद्यार्थी के समक्ष 235 मामले सूचीबद्ध थे। इनमें 92 नए थे। 4.15 बजे तक वह 29 ताजा मामलों की सुनवाई कर चुके थे। इसके बाद इस मामले की सुनवाई शुरू हुई, जो शाम 7 बजकर 10 मिनट तक चली।