इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) की सहायता से गर्भधारण करने वाली महिलाओं में स्तन और अंडाशय के कैंसर का जोखिम बढ़ जाता है। ऐसी महिलाओं को साल में एक बार कैंसर की जांच जरूर करानी चाहिए। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय में इस तरह के कई मामले सामने आ चुके हैं।
केजीएमयू की स्तन कैंसर और इंडोक्राइन रोग विशेषज्ञ डॉ. गीतिका नंदा सिंह ने बताया कि आईवीएफ उन महिलाओं के लिए गर्भधारण के लिए मददगार है, जो प्राकृतिक रूप से गर्भधारण नहीं कर पा रही हैं। यह एक प्रजनन तकनीक है जिसमें प्रयोगशाला में महिला के अंडे और पुरुष के शुक्राणु को निषेचित करके भ्रूण बनाया जाता है।
इसके बाद भ्रूण को महिला के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है। इस दौरान महिला को हार्मोन संबंधी दवाएं और इंजेक्शन दिए जाते हैं। ये हार्मोन कैंसर का कारण बन सकते हैं। केजीएमयू में जनरल सर्जरी विभाग में इस तरह के तीन मामले सामने आ चुके हैं। एक मामले में तो महिला को आईवीएफ से गर्भधारण के तीन महीने बाद ही स्तन कैंसर हो गया। ऐसे मामले में इलाज की चुनौती और भी बढ़ जाती है। अच्छी बात यह रही कि तीनों मामलों में स्तन कैंसर का इलाज हो गया।
स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में भी आए मामले
केजीएमयू में स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की प्रोफेसर डॉ. सीमा मेहरोत्रा ने बताया कि आईवीएफ से गर्भधारण करने वाली दो महिलाओं में स्तन कैंसर के मामले विभाग में आए हैं। इंडोक्राइनोलॉजी और इंडोक्राइन सर्जरी विभाग में भी इस तरह के मामले सामने आते हैं।
घबराने नहीं, सतर्क रहने की जरूरत
प्रो. सीमा मेहरोत्रा के मुताबिक आईवीएफ कराने के बाद घबराने की नहीं, बल्कि सतर्क रहने की जरूरत है। स्तन कैंसर की जानकारी शुरुआती स्तर में होने पर इलाज बेहद आसान और प्रभावी है। डिजिटल मैमोग्राफी से स्तन में कैंसर बनने से पहले ही उसकी पहचान हो जाती है। इसलिए हर साल जांच कराकर महिलाएं स्तन कैंसर के खतरे से बच सकती हैं।
इनसे बचें ताकि न पड़े आईवीएफ की जरूरत
कॅरिअर के चक्कर में देर से शादी, प्रिजर्वेटिव-पैकेजिंग वाला भोजन, मोटापा, धूम्रपान, शराब और तनाव
शहर में तेजी से बढ़ रहे आईवीएफ सेंटर
लखनऊ में आईवीएफ सेंटर की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इस समय इनकी संख्या 60 के करीब है। 10 वर्ष पहले तक शहर में गिने-चुने ही आईवीएफ केंद्र थे। खराब जीवन शैली और देर से शादी होने की वजह से बांझपन की समस्या बढ़ रही है। इस वजह से आईवीएफ केंद्र भी तेजी से बढ़ रहे हैं। इस समय डेढ़ से दो लाख रुपये से आईवीएफ सुविधा की शुरुआत हो रही है। दवाओं की जरूरत और आईवीएफ केंद्र के हिसाब से यह खर्च बढ़ता जाता है।