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उपचुनाव: नहीं दिखा 'मोदी इफेक्ट', सदमे में भाजपाई

Mon, 15 Sep 2014 11:39 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
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विधानसभा उपचुनाव के नतीजे तो मंगलवार को आएंगे। कौन जीता और कौन हारा, इसका आधिकारिक रूप से पता भी उसी दिन चलेगा। पर, दांव पर भाजपा ही है। सपा सहित शेष पार्टियों या प्रत्याशियों के लिए इन उपचुनाव में खोने को कुछ नहीं है।
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इन्हें जो भी मिलेगा तो वह इनकी उपलब्धियों के खाते में माना जाएगा अगर नहीं मिला तो इनकी स्थिति जस की तस रहेगी। पर, भाजपा की एक भी सीट पर हार इस पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बनेगी। क्या कुछ होगा यह तो अब दो दिन बाद ही सामने आएगा लेकिन मतदान के कम प्रतिशत ने भाजपा नेताओं के माथे पर थोड़ा पसीना जरूर ला दिया है।

हालांकि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने मतदान के बाद सभी सीटों पर पार्टी के जीतने का दावा किया है। बावजूद इसके उन्होंने जिस तरह चुनाव में मतदान का प्रतिशत कम रहने पर चिंता व्यक्त की है उससे भाजपा की बेचैनी को समझा जा सकता है।
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डॉ. वाजपेयी ने कहा, ‘उपचुनाव में इतना कम मतदान लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है।’ जाहिर है कि मतदान के कम प्रतिशत ने उन्हें उपचुनाव के नतीजों को लेकर कहीं न कहीं कुछ चिंता में जरूर डाल दिया है।

कम मतदान से कांटे का संघर्ष

वैसे तो 2012 के मुकाबले उपचुनाव वाली विधानसभा की सभी सीटों पर मतदान का प्रतिशत कम रहा है। पर, लखनऊ पूरब व नोएडा जैसी शहरी सीटों पर पिछले चुनाव के मुकाबले मतदान में काफी कमी चौंकाने वाली है।

पूरब में 2012 की तुलना में 19.13 प्रतिशत कम मतदान हुआ है। पिछले चुनाव में 53.13 प्रतिशत मतदान हुआ था। इस बार मतदान 34 प्रतिशत ही पहुंच पाया। इसी तरह नोएडा में 16.48 प्रतिशत कम मतदान हुआ है। नोएडा में 2012 के चुनाव में 48.18 प्रतिशत मतदान हुआ था। इस बार 32.50 प्रतिशत वोट ही पड़े।

बिजनौर, सिराथू (कौशांबी) और सहारनपुर नगर सीट पर भी पिछली बार की तुलना में 8 से 9 प्रतिशत कम मतदान हुआ है। कम मतदान का मतलब मुकाबले का भी नजदीकी हो जाना है।

इससे भाजपा की परेशानी बढ़ सकती है। कारण, पार्टी जीत भी जाए तो भी पहले के मुकाबले अंतर घट सकता है। इसके चलते विपक्ष को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि भाजपा की जमीन खिसक रही है।
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बेचैनी हो भी तो क्यों न

भाजपा की बेचैनी स्वाभाविक है। विधानसभा की जिन 11 सीटों पर शनिवार को वोट डाले गए, वे सभी सीटें भाजपा की है। वर्ष 2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी की हवा के बावजूद भाजपा ने इन सीटों पर अपना परचम फहराया था।

लोकसभा के लिए इसी वर्ष अप्रैल व मई में हुए चुनाव में भाजपा ने इन सीटों पर जीत ही हासिल नहीं की थी बल्कि विधानसभा चुनाव के मुकाबले ज्यादा वोट भी हासिल किया था। इसलिए एक भी सीट निकलना भाजपा के लिए भारी झटका होगा।

इसका असर भाजपा की विधानसभा 2017 के चुनाव की तैयारियों पर भी पड़ेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही इस चुनाव में प्रचार को न आए हों लेकिन नतीजे विपरीत रहने पर विपक्ष यह प्रचारित करेगा कि मोदी का जादू फीका पड़ रहा है।

समाजवादी पार्टी को फिर यह दावा करने का मौका मिल जाएगा कि सांप्रदायिक ताकतों को रोकने की क्षमता सिर्फ उसमें है।
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