राजनीतिक पार्टी की मुखिया महिला और पार्टी में महिला विंग ही नहीं। यह व्यवस्था हैरान करती है। आधी आबादी को तब और निराशा हाथ लगती है, जब जिला स्तर की कमेटी में भी भागीदारी शून्य मिलती है। बात मायावती और उनकी पार्टी बसपा की हो रही है।
लंबे समय से मायावती ही अपने दल का प्रमुख चेहरा हैं। उनके रहते हुए भी पार्टी में कोई महिला नेता नहीं पनपी। वहीं, अन्य प्रमुख दलों पर नजर डालें तो सभी के पास महिला मोर्चा है। ऐसे में सवाल उठता है कि वर्ष 2012 तक प्रदेश की सत्ता पर काबिज रहने वाली पार्टी के हाशिये पर पहुंचने के पीछे कहीं आधी आबादी को नजरअंदाज करना भी तो नहीं शामिल है? लगातार गिरते प्रदर्शन के बावजूद हाथी की चाल में कोई परिवर्तन नजर नहीं आ रहा।
मौजूदा समय में आधी आबादी के अधिकारों को लेकर देश में बहस चल रही है, वहीं प्रमुख पार्टी में महिला विंग का न होना अखरता है। एक दौर था, जब इसी अयोध्या के बगल में अकबरपुर संसदीय क्षेत्र की सांसद बनकर मायावती लगातार तीन बार लोकसभा पहुंची थीं। लोगों में परिवर्तन की उम्मीद जगी थी। पहली बार प्रदेश में किसी दलित महिला का कद इतना बड़ा हुआ था, लेकिन वर्ष 2014 के बाद से हालात में तेजी से परिवर्तन हुआ। सामाजिक परिवर्तन की बात करने वाली बसपा अंदरूनी बदलाव नहीं कर पाई। इसका असर मतदान प्रतिशत के रूप में सामने भी आने लगा है।
फैजाबाद में अब तक नहीं मिला महिला को टिकट... 1989 के लोकसभा चुनाव में पहली बार बसपा ने अपने उम्मीदवार उतारे थे। तब से अब तक 45 साल बीत चुके हैं, लेकिन पार्टी की ओर से अयोध्या लोकसभा सीट पर आज तक महिला उम्मीदवार नहीं उतारी गई। अयोध्या में बसपा की नगर कमेटी में एकमात्र महिला सदस्य नगर सचिव मीरा देवी रावत हैं।
पार्टी के साथ सभी वर्ग
बसपा जिलाध्यक्ष के के पासी का कहना है कि महिला कार्यकर्ताओं के लिए अलग से कोई विंग नहीं है। मुख्य कमेटी में ही उन्हें शामिल किया जाता है। बसपा की नीतियों और काम करने के तरीकों की वजह से पार्टी के साथ सभी वर्ग हैं। मायावती के शासनकाल में महिलाओं को जितनी सुरक्षा थी और सम्मान था, वो किसी अन्य के शासन में देखने को नहीं मिला।