बसपा सुप्रीमो मायावती न सिर्फ यूपी में, बल्कि देश भर में भी प्रमुख एससी चेहरा मानी जाती हैं। उन्हें न सिर्फ यूपी, बिहार, उत्तराखंड व मध्य प्रदेश तक बल्कि गुजरात, महाराष्ट्र से लेकर छत्तीसगढ़, कर्नाटक व पंजाब जैसे राज्यों में भी एससी मतदाताओं के मूड और समीकरण का पूरा अंदाजा है।
विश्लेषक बताते हैं कि राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर हाल में वर्ग विशेष का चेहरा बनकर उभरे कई युवा नेताओं के पीछे किसी न किसी बड़ी राजनीतिक शक्ति की पोल खुलती आई है। मायावती ने इसे समय-समय पर भांपा और अपनी परख का लोहा मनवाया।
उन्होंने गुजरात में जिग्नेश मेवाणी और मध्य प्रदेश में देवाशीष जाररिया के कांग्रेस कनेक्शन बताने में बिलकुल देरी नहीं की। मायावती द्वारा जरारिया से पार्टी का कोई संबंध न होने का एलान किए जाने के बाद वह कांग्रेस में शामिल हो गए।
मायावती एससी की प्रमुख चेहरा तो हैं ही, जाटव समाज से होने की वजह से इस वर्ग में उनका एकाधिकार माना जाता रहा है। एससी वर्ग में पश्चिमी यूपी में इस समाज की सर्वाधिक हिस्सेदारी है। मायावती की तरह भीम सेना प्रमुख चंद्रशेखर भी पश्चिमी यूपी और जाटव समाज से आते हैं।
ऐसे में पार्टी से बाहर कोई एससी, खासकर जाटव चेहरा बनकर उभरे, बसपा का चौकन्ना होना लाजिमी है। बसपा अध्यक्ष ने सहारनपुर के शब्बीरपुर में जातीय बवाल के तत्काल बाद वहां का दौरा किया।
मगर, मायावती ने वहां जाने पर चंद्रशेखर को पूरी तरह से नजरअंदाज किया। अब जब लोकसभा चुनाव से पहले प्रियंका चंद्रशेखर से मिलने पहुंचीं, मायावती का चंद्रशेखर के पीछे कांग्रेस के होने की आशंका पुख्ता हो गई। उन्होंने पूरे देश में कहीं से भी कांग्रेस से मिलकर चुनाव न लड़ने की बात दोहरा दी।
भाजपा एससी वर्ग को साधने के लिए सीधे अभियान चलाती आई है। कांग्रेस की रणनीति समझें तो वह पहले लक्षित वर्ग को अपनी ओर जोड़ने के लिए युवा चेहरे की पहचान और फिर पर्दे के पीछे से समर्थन देना शुरू कर दिया है। उचित समय आने पर कांग्रेस उसे अपने साथ मिला लेती है।
जिग्नेश मेवाणी को विधानसभा चुनाव में निर्दल प्रत्याशी के रूप में समर्थन किया तो मध्य प्रदेश में जाररिया को शामिल कर लिया। पिछड़े वर्ग के हार्दिक पटेल भी आखिरकार कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। चंद्रशेखर का भी कांग्रेस कनेक्शन सामने आ ही गया है।
ओमवती जाटव : प्रदेश की बसपा सरकार में मंत्री रहीं ओमवती जाटव के पति आरके सिंह रिटायर्ड आईएएस अफसर हैं। ओमवती 1985 में पहली बार कांग्रेस से विधायक चुनी गई थीं। इसके बाद सपा में चली गईं। 1996 में वह सपा से विधायक और 1998 में बिजनौर से सांसद चुनी गईं। 2002 में वह नगीना से फिर विधायक बनीं। 2007 में ओमवती ने सपा छोड़ बसपा जॉइन कर ली। वह चौथी बार विधायक बनीं और बसपा सुप्रीमो मायावती ने उन्हें मंत्री बनाया। 2014 लोकसभा चुनाव से पहले ओमवती पाला बदल कर भाजपा में चली गईं लेकिन भाजपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया। 2017 में भाजपा ने उन्हें नगीना विधानसभा क्षेत्र से प्रत्याशी बनाया, लेकिन वह हार गईं। इस बार ओमवती कांग्रेस में चली गईं हैं और उन्हें कांग्रेस ने उन्हें प्रत्याशी बना दिया।
डॉ. प्रीता हरित : 1987 बैच की आईआरएस अधिकारी प्रीता मूल रूप से तो हरियाणा की रहने वाली हैं, लेकिन दिल्ली में आयकर आयुक्त और मेरठ व सहारनपुर में प्रिंसिपल कमिश्नर आयकर के पद पर रही हैं। प्रीता बहुजन सम्यक संगठन चलाती हैं और सरकारी सेवा में रहते हुए भी वह अनुसूचित वर्ग से जुड़े मुद्दों पर मुखर रही हैं। प्रीता नौकरी से वीआरएस से लेकर कांग्रेस में शामिल हो गई हैं। अटकलें हैं कांग्रेस उन्हें आगरा से प्रत्याशी भी बना सकती है। गठबंधन में आगरा सीट बसपा के पास है।
बृजलाल खाबरी : पिछले लोकसभा चुनाव में बुंदेलखंड की जालौन (सुरक्षित) सीट से खाबरी बसपा प्रत्याशी थे। पिछले चुनाव 2,61,429 वोट पाकर नंबर दो पर थे। इस बार गठबंधन में यह सीट सपा को चली गई। कांग्रेस ने खाबरी को शामिल कर प्रत्याशी बना दिया है। खाबरी चुनाव को तगड़े त्रिकोण में बदलने का माद्दा रखते हैं, जिसमें नतीजा कुछ भी हो सकता है।
कैसरजहां : सपा-बसपा गठबंधन में सीतापुर सीट बसपा के हिस्से में आई है। पिछले लोकसभा चुनाव में यह सीट भाजपा जीती थी, लेकिन बसपा प्रत्याशी कैसरजहां 3,66,519 वोटों के साथ नंबर दो पर थीं। लोगों को उम्मीद थी कि कैसरजहां गठबंधन की प्रत्याशी होंगी, लेकिन अटकलें शुरू हो गईं कि बसपा से उनका टिकट कट रहा है और एक पूर्व मंत्री को प्रत्याशी बनाने की तैयारी है। कैसरजहां बिना देर किए कांग्रेस में चली गईं। कांग्रेस ने उन्हें प्रत्याशी बना दिया है।
रामशंकर भार्गव : कांग्रेस ने पूर्व सांसद रामशंकर भार्गव को लखनऊ की मोहनलालगंज सुरक्षित सीट से प्रत्याशी बनाया है। वैसे तो भार्गव इसी महीने सपा छोड़कर कांग्रेस में आए हैं, लेकिन वह सपा में बमुश्किल सवा साल रहे हैं। 12वीं लोकसभा के चुनाव में वह बसपा के टिकट पर ही सीतापुर की मिश्रिख सुरक्षित सीट से लोकसभा सांसद चुने गए थे। भार्गव के आने से मोहनलालगंज में बसपा की ही चुनौती बढ़नी तय है।