मुलायम सिंह ने लखनऊ में फरवरी में हुई बैठक में कार्यकर्ताओं से कहा था कि उनकी आपत्ति के बावजूद अखिलेश ने बसपा से गठबंधन किया है, आधी सीटें बांटी है। इसका आधार क्या है? इनमें से 25-26 सीटें जीतने योग्य थीं। इतनी मजबूत पार्टी बनाई थी, जो तीन बार सत्ता में आई, तीनों बार वे सीएम बने। लेकिन अब पार्टी के ही लोग पार्टी को नुकसान कर रहे हैं।
सीट बंटवारे में सपा के गढ़ लेकर जीती बसपा
चुनावी नतीजों में बसपा को सपा से दो गुनी सीट मिलते ही सवाल उठने लगे हैं कि क्या बसपा का वोट सपा प्रत्याशियों को ट्रांसफर नहीं हुआ? सवाल से पहले यह जानना जरूरी है कि गठबंधन में बसपा की बेहतर सफलता के पीछे कारण मायावती को पसंदीदा सीटें दिया जाना है। बसपा जिन 10 सीटों पर चुनाव जीती है, उनमें पिछले चुनाव में 6 सीटों पर सपा दूसरे नंबर पर रही थी।
बसपा जिन 38 सीटों पर चुनाव लड़ी उनमें कई सपा का मजबूत गढ़ रही हैं। इनमें से कई सीट बसपा ने बंटवारे में अपने हिस्से में ले लीं। नगीना, बिजनौर, अमरोहा, श्रावस्ती, गाजीपुर व लालगंज में सपा दूसरे नंबर पर रही थी। ये सीट सपा के लिए मुफीद मानी जाती रही हैं। इन पर इस बार बसपा चुनाव लड़ी और दलित-मुस्लिम समीकरण ऐसा बना कि उसकी आसानी से जीत हो गई। केवल तीन सीट ऐसी हैं जिन पर बसपा 2014 में रनर-अप रही थी। इनमें अंबेडकर नगर, जौनपुर और घोसी सीट शामिल हैं। जौनपुर भी यादव बहुल है जहां बसपा ने श्याम सिंह यादव को प्रत्याशी बनाया। सहारनपुर मेें कांग्रेस दूसरे और बसपा तीसरे नंबर पर रही थी।
नगीना, अमरोहा व बिजनौर में 30-40 फीसदी मुस्लिम वोटर
नगीना, अमरोहा व बिजनौर सीट पर मुस्लिम मतदाता 30 से 40% के बीच हैं, जबकि मुरादाबाद में 45%, संभल में 41 व रामपुर में लगभग 50% फीसदी मुस्लिम वोटर हैं। रामपुर को छोड़कर अन्य सीटों पर अनुसूचित जाति के वोटरों की तादाद भी अच्छी है। मायावती ने नगीना, अमरोहा व बिजनौर सीटें सपा से ले लीं और दलित-मुस्लिम समीकरण से जीत मिली। मुरादाबाद, संभल व रामपुर में इसी समीकरण से सपा विजयी रही। सपा को कई सीट ऐसी दी गईं जहां वह कभी जीती ही नहीं है। इनमें लखनऊ, वाराणसी, इलाहाबाद जैसी शहरी सीटें भी शामिल हैं।