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नगर निगमों में भाजपा, छोटे निकायों में निर्दलीयों का कब्जा

Sat, 28 Oct 2017 01:53 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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डेमो
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निकाय चुनाव का बिगुल बजते ही राजनीतिक दलों की परीक्षा का एक और दौर शुरू हो गया। जय व पराजय का पता एक दिसंबर को चलेगा, पर इस चुनाव में सबसे ज्यादा अगर किसी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है तो वह है भाजपा। प्रतिष्ठा इसलिए दांव पर नहीं लगी है कि भाजपा इस समय प्रदेश में सत्ता में है बल्कि  एक दल के रूप में यही वह पार्टी है जो इस समय ज्यादातर नगर निगमों में महापौर पद पर काबिज है।
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छोटे नगरों यानी नगर पालिका परिषदों तथा नगर पंचायतों में निर्दलीयों का कब्जा है। वर्ष 2012 में हुए चुनाव में 12 नगर निगमों में 10 में भाजपा के महापौर जीते थे। दो पर निर्दलीय जीते थे, पर इलाहाबाद की महापौर अब भाजपा में शामिल हो चुकी हैं। इस प्रकार यह संख्या 11 हो गई है। अब सिर्फ बरेली में सपा समर्थित निर्दलीय महापौर है।

पिछली बार 194 नगर पालिका परिषदों के अध्यक्ष के चुनाव में भाजपा 42 में जीती थी जबकि 130 में निर्दलीय जीते थे। इसी तरह 423 नगर पंचायतों के चुनाव में भाजपा 36 में अध्यक्ष पद पर जीती थी। निर्दलीयों ने 352 नगर पंचायतों में अध्यक्ष पद की कुर्सी कब्जाई थी।
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प्रदेश में इस बार चार नए नगर निगमों को मिलाकर 16 में चुनाव होने हैं। चार नए नगर निगमों सहारनपुर, फिरोजाबाद, अयोध्या और मथुरा-वृंदावन में पहली बार चुनाव होंगे। वैसे तो सहारनपुर नगर निगम का गठन 2012 से पहले ही हो गया था, पर चुनाव नहीं हो पाया था। अखिलेश सरकार ने फिरोजाबाद को भी नगर निगम का दर्जा दे दिया था।

चुनौती सपा, बसपा व कांग्रेस की भी

डेमो - फोटो : डेमो
वर्तमान योगी सरकार ने अयोध्या व फैजाबाद को मिलाकर अयोध्या तथा मथुरा-वृंदावन को मिलाकर मथुरा-वृंदावन नगर निगम बनाए हैं। पिछली बार 194 नगर पालिका परिषद में चुनाव हुए थे। इस बार इनकी संख्या 198 हो गई है। पिछली बार 423 नगर पंचायतों में चुनाव हुए थे। इस बार सरकार के कुछ बड़ी ग्राम पंचायतों को नगर पंचायतों का दर्जा दे देने से इनकी संख्या 438 हो गई है।

ये चुनाव भाजपा की इसलिए भी बड़ी परीक्षा हैं क्योंकि इसे न सिर्फ अपने कब्जे वाली सीटें बरकरार रखनी हैं बल्कि छोटे निकायों में भी कब्जा करके अपनी लोकप्रियता साबित करनी है। साथ ही अयोध्या, मथुरा-वृंदावन, सहारनपुर और फिरोजाबाद जैसे नए नगर निगमों में भी झंडा फहराकर यह साबित करना है कि विधानसभा या उससे पहले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में उसे मिला समर्थन संयोग नहीं था।

इसी के साथ भाजपा को सभी निकायों में सदन में भी बहुमत हासिल करने की चुनौती है। कारण, इस समय नगर निकाय के किसी सदन में भाजपा के सदस्य बहुमत के आंकड़े से पीछे ही हैं। चुनौती सपा, बसपा व कांग्रेस की भी कम नहीं है। तीनों दलों ने जिस तरह इस चुनाव को अलग-अलग लड़ने का फैसला किया है, उसके मद्देनजर इन सभी को जनता के बीच पकड़ व पहुंच साबित करने की चुनौती है।

कारण, भाजपा व कांग्रेस के अलावा अभी तक कोई दल अपने चुनाव चिह्न पर ये चुनाव नहीं लड़ता था। सपा और सपा पहली बार अपने निशान पर चुनाव लड़ने जा रहे हैं। जाहिर है कि इस बार के नतीजे सीधे-सीधे सभी दलों की जनता के बीच पकड़-पहुंच का पैमाना बनेंगे। यही नहीं, मथुरा व वृंदावन तथा अयोध्या अगर भाजपा की बड़ी परीक्षा होगा तो फिरोजाबाद सपा और सहारनपुर नगर निगम का चुनाव बसपा के लिए कम प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनेगा।
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देखें, 2012 के निकाय चुनाव : एक नजर में 

डेमो - फोटो : डेमो
फिरोजाबाद से मोदी लहर में भी मुलायम सिंह यादव के कुनबे के अक्षय यादव सांसद चुने गए थे। अब देखना होगा कि यहां नगर निगम के चुनाव में भी सपा ही कब्जा करती है या भाजपा जीतती है। सहारनपुर वह जगह है जहां पर दलित समाज व क्षत्रिय समाज के बीच संघर्ष काफी दिन तक राजनीतिक गलियारों में सुर्खियों में रहा। बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी सहारनपुर पहुंचकर दलित स्वाभिमान का नारा बुलंद किया था। जाहिर है कि यहां का नतीजा भाजपा और बसपा की राजनीतिक जमीन सामने लाएगा।

2012 के निकाय चुनाव : एक नजर में 
अब नगर निगम : 16
(अयोध्या, मथुरा-वृंदावन, सहारनपुर व फिरोजाबाद नए)
पिछली बार चुनाव हुए थे : 12
महापौर भाजपा : 11 (इलाहाबाद की अभिलाषा नंदी गुप्ता के भाजपा में शामिल होने के बाद, पहले 10 थे )
महापौर सपा समर्थित : 01

नए निगमों को छोड़कर पार्षदों की संख्या : 980
भाजपा : 304        कांग्रेस : 100
निर्दलीय : 558      अन्य :     18    

अब कुल नगर पालिका परिषद :  198
जहां पिछली बार अध्यक्ष का चुनाव हुआ : 194
भाजपा : 42                  कांग्रेस : 15
निर्दल : 130                 अन्य :    07
 
अब कुल नगर पंचायतें : 438
जहां पिछली बार अध्यक्ष का चुनाव हुआ : 423
भाजपा : 36              कांग्रेस : 21
निर्दल : 352             अन्य :  14









 
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