जमीन की खरीद-बिक्री के बाद दाखिल खारिज से पहले लेखपाल का बयान होना अनिवार्य कर दिया गया है। इससे जमीन से जुड़े विवाद में कमी आने की संभावना है। राजस्व परिषद के एक अधिकारी ने बताया कि जमीन की रजिस्ट्री के बाद 35 दिन के भीतर बिक्री करने वाले का नाम खतौनी से हटाया जाता है और खरीदने वाला का दर्ज किया जाता है।
दाखिल खारिज से पहले लेखपाल की रिपोर्ट लेने की व्यवस्था पर अमल न होने से जमीन की रजिस्ट्री में तमाम विसंगतियां आ रही थीं। मसलन, अनुसूचित जाति-जनजाति की जमीन की रजिस्ट्री सामान्य जाति के लोग करा रहे थे। बाद में, उसी आधार पर दाखिल खारिज भी कर दिया जाता था।
इसके अलावा, कई लोग ऐसे होते हैं जिनका खतौनी में नाम होता है लेकिन मौके पर कब्जा नहीं होता। विवादित होने के बावजूद वे जमीन बेच देते हैं। इसी तरह जमीन की श्रेणी व विवाद की जानकारी भी नहीं मिल पाती है। इसके अतिरिक्त, कीमती व्यावसायिक व आवासीय जमीन का कम मूल्य दिखाकर खरीद-बिक्री व दाखिल खारिज करा लिया जाता है।
अधिकारी ने बताया कि राजस्व संहिता नियमावली में दाखिल खारिज से पहले लेखपालों का बयान लेने की व्यवस्था है लेकिन इस पर अमल नहीं हो रहा था। उन्होंने बताया कि लेखपाल संघ के महामंत्री ब्रजेश श्रीवास्तव ने इस ओर परिषद का ध्यान दिलाया था।
राजस्व परिषद की आयुक्त व सचिव लीना जौहरी ने दाखिल खारिज की प्रक्रिया में लेखपालों का बयान लेने के बारे में विस्तृत आदेश जारी किया है। अब लेखपाल के बयान से जमीन की मौजूदा स्थिति पर पहले रिपोर्ट आ जाएगी। इससे गलत तरीके से कराई गई रजिस्ट्री का दाखिल खारिज नहीं हो सकेगा।