सपा में मुलायम सिंह के बाद सबसे कद्दावर नेता बेनी बाबू पिछले चुनाव तक तराई क्षेत्र से लेकर अवध के जिलों में कुर्मी वोटों की दिशा तय करने वाला चेहरा कहे जाते थे। सपा से कुछ मतभेदों के चलते कांग्रेस में गए तो वहां भी बड़ा पिछड़ा चेहरा का तमगा रहा।
पिछले लोकसभा चुनाव में वह गोंडा से कांग्रेस के टिकट पर हारे क्या, मानो सब कुछ बदल गया। फिलहाल वह सपा में लौट आए हैं और राज्यसभा के सदस्य भी हैं, पर सपा के चुनाव प्रचार अभियान से गायब हैं।
भगवती सिंह भी कभी सपा के चुनाव अभियान का अहम हिस्सा हुआ करते थे। लोकसभा के पिछले चुनाव तक वह सक्रिय रहे, पर उन पर हावी हो चुकी उम्र ने उन्हें भी समर भूमि से दूर बैठा दिया है।
लोकसभा के पिछले चुनाव में सपा प्रत्याशियों को अपनी जीत के लिए नेताजी मुलायम सिंह यादव काफी जरूरी लगा करते थे। वक्त बदला और सपा के समीकरण भी बदले। प्रदेश में लोकसभा की लगभग आधी सीटों की चुनावी जंग लड़ी जा चुकी है, पर कभी उत्तर प्रदेश के चुनाव का सबसे चर्चित चेहरा रहने वाला यह सियासी दिग्गज अपने संसदीय क्षेत्र मैनपुरी तक सीमित होकर रह गया।
लखनऊ के पूर्व महापौर डॉ. दाऊजी गुप्त भी कभी प्रत्याशी के रूप में तो कभी मंच पर वक्ता तो कभी समर्थक के रूप में चुनावी चौपालों का अहम हिस्सा रहते थे। मौजूदा चुनाव में उनकी पहले जैसी सक्रियता नहीं दिख रही।
स्वामी चिन्मयानंद और डॉ. रामविलास वेदांती जैसे चेहरे भी एक समय भाजपा का चुनावी मंच सजाया करते थे। इस बार ये भी नहीं दिखाई दे रहे।