वाजपेयीजी का भी जवाब नहीं। बोलना शुरू करते हैं तो छक्के छुड़ा देते हैं। पर, इस बार ऐसा बोले कि उनके शुभचिंतकों के ही छक्के छूटे जा रहे हैं। पर, करें क्या? जानते हैं
कि सच बोले तो शुभचिंतकों की श्रेणी से बाहर हो जाएंगे। इसलिए चुप्पी साधे हैं। दरअसल, वाजपेयी जी ने मोदी की कानपुर रैली को ‘न भूतो न भविष्यति’ कहा।
बस जैसे लोगों को मौका मिल गया। सवाल उठा दिया गया कि वाजपेयीजी क्या अटलजी की रैलियां भूल गए? मामला यहीं तक रहता तब भी गनीमत थी। पर, यहां तो मामला इससे
भी आगे का हो गया है। लोग टीम मोदी से ही पूछने लगे हैं कि क्या कानपुर रैली के बाद मोदी की रैलियों में उतनी भीड़ नहीं आने वाली है जो ‘न भविष्यति’ कहा जा रहा है।
इसका असर तो जो होगा वह होगा, पर बुजुर्गों ने सच ही कहा है, ‘तोल-मोलकर बोल।’