अमीनाबाद को अतिक्रमण मुक्त करने में विफलता का एक बड़ा कारण है, नगर
निगम प्रशासन की आधी-अधूरी कवायद।
यहां नगर निगम ने आठ मीटर से चौड़ी सड़क
पर पीली पट्टी तो खींच दी लेकिन फेरी नीति के तहत पटरी दुकानदारों का
पंजीकरण अब तक शुरू नहीं किया।
इससे सड़क पर अतिक्रमण करने वाले दुकानदारों
के खिलाफ कार्रवाई भी आसान नहीं है। इसके अलावा नगर निगम को आर्थिक नुकसान
भी हो रहा है।
यदि नगर निगम फेरी नीति केतहत पंजीकरण कर ले तो उसे पूरे
शहर से सालाना करीब 50 करोड़ रुपये की आमदनी होगी।
पटरी
दुकानदारों और ठेले-खोमचे वालों को व्यवस्थित करने के लिए केंद्र सरकार ने
फेरी नीति बनाई है। इसे लागू करने की प्रदेश सरकार भी मंजूरी दे चुकी है।
उसके बाद पिछले करीब पांच साल से नगर निगम प्रशासन इसको लागू करने की कवायद
कर रहा है, लेकिन यह लागू अब तक नहीं हो पाई है।
अमीनाबाद का मामला गरमाने
के बाद सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के निर्देशों के तहत पटरी दुकानदारों को
हद में करने के लिए पीली पट्टी खींची गई है लेकिन दुकानदारों का पंजीकरण
नहीं किया गया है। सब काम कागज पर हो रहा है।
धरातल पर कुछ नहीं दिख रहा
है। यह हाल तब है जबकि इसको लेकर शहर के पटरी दुकानदार कई बार बड़े आंदोलन
कर चुके हैं।
इसके बाद नगर निगम प्रशासन ने वेंडिंग और नान वेंडिग जोन
चिन्हित करने काम काम शुरू किया जो अब तक पूरा नहीं हो सका है।
दुकानदारों
के विरोध को देखते हुए दो साल पहले जुलाई से दुकानदारों को चिन्हित क्षेत्र
में फेरी लाइसेंस जारी करने का ढिंढोरा पीटा गया मगर यह भी दिखावा साबित
हुआ।