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'वादा करती हूं, ऐसे लेख नहीं लिखूंगी जिससे कोई हांफने लगे'

Sun, 10 Nov 2013 05:29 PM IST
नीरज अम्बुज/लखनऊ
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रायउमानाथ बली प्रेक्षागृह में आयोजित कथाक्रम के दूसरे और आखिरी दिन ‘भूमण्डलीकृत समाज और साहित्य की मशाल’ विषय पर बहस के सिलसिले को आगे बढ़ाया जाना था, लेकिन मुद्दा लेखिका मैत्रेयी पुष्पा का एक लेख बन गया।
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जिसे लेकर महिला साहित्यकारों ने अपना विरोध दर्ज कराया। आलम यह हो गया कि तल्खी बढ़ने पर लेखिका को मंच से सफाई देनी पड़ी।

हालांकि, कुछ देर बाद मामला शांत हो गया, लेकिन इसको लेकर चर्चा का दौर कार्यक्रम के समापन तक चलता रहा।

ध्यान रहे कि मैत्रेयी पुष्पा ने बीते सितम्बर माह में एक अखबार में ‘स्त्री विमर्श और आत्मालोचन’ शीर्षक से लेख लिखा था।

जिसमें युवा लेखिकाओं की उम्र व लेखन को लेकर कटाक्ष किए गए हैं। जिस पर महिला साहित्यकार लम्बे अर्से से फेसबुक व साहित्यिक पत्रिकाओं में विरोध दर्ज कराती आ रही हैं।

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रविवार को यह विरोध खुलकर कथाक्रम के मंच पर उस वक्त सामने आ गया साहित्यिक पत्रिका ‘बिंदिया’ की संपादक गीताश्री ने लेख को सवाल खड़े कर दिए।

उन्होंने कहा कि मैत्रेयी पुष्पा का लेख युवा लेखिकाओं की क्षमता व लेखन को खारिज करता है। जबकि लेखिकाएं उन्हीं के शुरू किए गए बोल्ड लेखन के ट्रेंड को आगे बढ़ा रही हैं।
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कथाकार मनीषा कुलश्रेष्ठ ने अप्रत्यक्ष रूप से लेख पर विरोध दर्ज कराया। उन्होंने कहा कि पुरानी पीढ़ी के साहित्यकारों को हमेशा यह शिकायत रहती है कि उनकी पीढ़ी के बाद नए साहित्यकार कुछ लिख ही नहीं रहे हैं।
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वे हमेशा मुगालते में रहना पसंद करते हैं। उन्होंने आगे कहा कि कथाकार अगर जमीनी बातें करते हैं तो उस पर अटल भी रहना चाहिए।

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