सरकार ने 2013 बैच के आईएएस अधिकारियों की जिलाधिकारी के पद पर तैनाती शुरू कर दी है। लेकिन, 31 आईएएस अफसरों में से केवल तीन को ही अब तक मौका मिल सका है। इस बैच के अफसरों को उम्मीद है कि नए तबादलों में उन्हें मौका मिल सकता है। हालांकि, इससे पुराने बैच के कई आईएएस अधिकारी भी अभी तक कलेक्टर नहीं बन पाए हैं। ये भी कलेक्टर की कुर्सी पाने के लिए प्रयासरत हैं।
कलेक्टरों के बारे में फीडबैक भी अहम
कुछेक जिलों के डीएम व स्थानीय जनप्रतिनिधियों के बीच समन्वय न हो पाने की चर्चा आम है। पूर्वांचल के एक सांसद अपने जिले के डीएम के खिलाफ मोर्चा ही खोले हुए हैं। अवध के एक डीएम की अपनी छवि तो ठीक है, पर उनके खिलाफ शिकायत है कि उन्होंने अपने जिले के एक सांसद की शह पर होने वाले अवैध खनन तथा स्कूल, मंदिर व नजूल की भूमि पर कब्जों से आंखें बंद कर रखी हैं। हाथरस के डीएम को लेकर भी सरकार को फैसला करना बाकी है। विधानसभा उपचुनाव व एमएलसी चुनाव के नतीजों का असर भी तबादलों पर नजर आ सकता है।
आईएएस से लेकर पीसीएस तक कई अधिकारी लंबे समय से नई तैनाती की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनकी अपनी समस्या है। एक सिटी मजिस्ट्रेट की तैनाती अवध के जिले में है और पति पश्चिम में तैनात हैं। बेटा कहीं और पढ़ाई कर रहा है। वह पति के निकट महत्वहीन से महत्वहीन पोस्टिंग की गुजारिश कर चुकी हैं। इसी तरह दो वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी लंबे समय से चयन आयोगों में तैनात हैं। वह वहां से हटने के लिए सक्षम अधिकारियों से कई बार गुजारिश कर चुके हैं।
एक आईएएस अधिकारी पश्चिम के मंडल में हैं और उनके पति शासन में तैनात हैं। पति को बच्चे की परवरिश करनी पड़ रही है। पति चाहते हैं कि पत्नी भी लखनऊ आ जाएं। इसी तरह परिवार में आश्रित की बीमारी व वाजिब समस्याओं वाली अर्जियों पर भी निर्णय का इंतजार है। अफसरों को लगता है कि अभी बात नहीं बनी तो 2022 के विधानसभा चुनाव तक हिल पाना मुश्किल हो जाएगा।