सोनिया गांधी तीसरी बार यहां से सांसद है। दस साल सत्ता के शीर्ष पर रहीं। खूब सारे वादे हुए। इलाके के लोगों ने सपने भी खूब देखे। पर सबसे शक्तिशाली राजनीतिक महिला माने जाने वाली सोनिया के इलाके में सपनों को जमीन पर उतारने का काम पूरा नहीं हो पाया।
लालगंज और डलमऊ इलाके के लाखों किसानों की खेतों की सिंचाई का एकमात्र जरिया पुरवा ब्रांच बड़ी नहर के पुनरुद्धार की सौ करोड़ रुपये की परियोजना फाइलों से बाहर नहीं निकल पाई।
उल्टे यह जरूर हुआ कि कभी इलाहाबाद तक जाने वाली यह नहर डलमऊ पंप कैनाल की भेंट चढ़ने के बाद माइनर में तब्दील हो गई। उसमें कई वर्षों से पानी के दर्शन नहीं हुए। पटरिया खुद रही हैं। अवैध कब्जे होते जा रहे हैं।
लोगों का यही कहना हैं कि इंदिरा गांधी के किए एहसानों का बदला चुकाने का नतीजा रायबरेली भुगत रही है।
रेल कोच काराखाना बनाने का सपना हुआ साकार
रेल कोच कारखाना बनाने का सपना तो साकार हुआ। पर, रेल पहिया कारखाना का वायदा अभी गर्भ में ही है। रायबरेली के अधिकांश क्षेत्र पानी के लिए तरस रहे हैं। बछरावां व ऊंचाहार इलाकों को छोड़ दें तो बिजली की भी काफी किल्लत है।
सड़कों का निर्माण तो दूर, इलाके के कुछ जनप्रतिनिधियों द्वारा गंगा के किनारे अवैध खनन को कुटीर उद्योग जैसा बना देने की कोशिश ने खजूर गांव सहित कई इलाकों की सड़कों को गड्ढों में तब्दील कर दिया है।
अवैध खनन का कारोबार सूबे में सत्तारूढ़ दल के विधायक के संरक्षण में होने के कारण इलाके के लोगों ने जुबान पर ताला डाल लिया है। सिर्फ खजूर गांव ही नहीं, कई अन्य इलाकों में अवैध खनन से निकली बालू व मिट्टी से ऊपर तक भरे ट्रक, डंपर व ट्रैक्टर गांव के संपर्क मार्गों का सीना चाक कर रहे हैं।
पर, लोग कुछ नहीं बोलना चाहते। मुंह खोलते हैं तो सिर्फ इतना कहते हैं, ‘आप तौ चले जइहो लेकिन हमार-सबका जउन हाल होई, ऊ हमहैं जानित है।’
कहने को वीवीआईपी इलाका है। पर, हालात बद से बदतर
रायबरेली के कई गांव के लोग जो कुछ बताते हैं, उसके अनुसार, लोग इंदिरा गांधी के एहसानों का बदला चुकाने का नतीजा भुगत रहा है। कहने को वीवीआईपी इलाका है। पर, हालात बद से बदतर हैं।
सूबे की सरकार इसलिए कुछ नहीं करती क्योंकि यहां की दुश्वारियों के बीच ही उसकी वोटों की गणित मजबूत होती है। केंद्र सरकार जिस तरह रेलवे के टाइम टेबल में होने के बावजूद वाया लालगंज, कानपुर-प्रयाग इंटरसिटी ट्रेन’ चलाने पर मौन है, उससे संकेत मिलने लगे हैं कि मोदी सरकार के कार्यकाल में इस इलाके को सोनिया के समर्थन का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
सोनिया रहीं भी तो उन्होंने वादे तो खूब किए, लेकिन जमीन पर उतारने की चिंता नहीं की। आम लोगों से मिलती तो कुछ जानतीं। पर, उनका संपर्क व संवाद तो चंद लोगों तक ही रहा। देखो, कब तक यह हालात रहते हैं।
इंदिरा को दस में से दस, सोनिया को बमुश्किल 4-5 नंबर
लोग कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि काम नहीं हुए, लेकिन मूल जरूरतों को पूरा करने वाले बहुत कम।
इलाके के लोग सोनिया की सास इंदिरा गांधी को तो दस में दस लेकिन उन्हें संकोच के साथ चार-पांच नंबरों तक ही पहुंचाते हैं। हालांकि, सोनिया की रायबरेली की तुलना अमेठी से करें तो वे राहुल पर बीस बैठती हैं।
इंदिरा जैसा जुड़ाव नहीं सोनिया का
शिवगढ़ इलाके के देहली गांव के ओमप्रकाश पाण्डेय बताते हैं कि इलाके के लोगों से सोनिया का जुड़ाव, इंदिरा जैसा नहीं है। सिर्फ चुनाव में मुख्य सड़कों से रोड शो करते हुए निकल जाने के अलावा।
पाण्डेय के पास बैठे एक सज्जन बोल पड़ते हैं, ‘कभी-कभार प्रियंका जरूर अंदर देहातों में जाती हैं।’ विकास के सवाल पर एक साथ कई आवाजें गूंजती हैं, ‘जो इंदिरा जी ने किया भी था। वह भी मिटता व खत्म होता जा रहा है।’
कब तक चलेगा यह सरोकार, बदल रही है युवा पीढ़ी
लोग बताते हैं कि वे तो इंदिरा के उपकारों का बदला चुकाने के लिए सोनिया को सांसद के लिए वोट देते आए हैं। पर, युवा पीढ़ी बदल रही है। सोनिया के चलते शिवगढ़ को कुछ मिलना तो दूर उल्टे मिली सुविधाएं भी छिन गई है।
इंदिरा ने इस क्षेत्र के लोगों को लखनऊ, कानपुर, रायबरेली और पूर्वांचल के आजमगढ़ तक आने-जाने के लिए परिवहन निगम की बसों का संचालन शुरू कराया था।
शिवगढ़ में बस स्टेशन की एक बड़ी बिल्डिंग भी बनवाई गई थी। इंदिरा के प्रयासों से ही इस इलाके में 1976 में बिजली आई थी। बेंती अनाज और चमड़े की बड़ी मंडी के रूप में स्थापित हुआ था।
राजीव गांधी रायबरेली से सांसद तो नहीं थे लेकिन उन तक तो शिवगढ़ का इलाका नेहरू, गांधी परिवार के एजेंडे में शामिल रहा।
उसके बाद यहां की अनदेखी शुरू हो गई। बसें बंद हो गई। बस अड्डे पर ताला लग गया। इलाके को एक सरकारी राजकीय इंटर कॉलेज तक न मिल पाया।
... और पीड़ा यह भी
लालगंज, बीघापुर (रायबरेली से सटे उन्नाव का इलाका) के लोगों की लंबे समय से मांग रही है कि कलकत्ता से वाया लालगंज एक ट्रेन चलाई जाए। दरअसल यहां के लाखों लोग कलकत्ता में नौकरी करते हैं और अक्सर आते-जाते रहते हैं। ट्रेन की मांग इंदिरा के समय से हो रही है। सोनिया हर चुनाव में इसका वादा तो करती हैं पर, सिर्फ वादा ही।
रायबरेली में आज भी इंदिरा के नाम व काम की छाप
न सिर्फ शिवगढ़ बल्कि पूरी रायबरेली में आज भी इंदिरा के नाम व काम की छाप ही सुनने को मिलती है। इसी के साथ यह सवाल व शिकायतें भी कि सत्ता में रहने के बावजूद सोनिया अपनी सास के द्वारा लोगों को रोटी-रोजी मुहैया कराने वाले कारखानों व संस्थाओं को न बचा पाई।
इनमें इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्रीज (आईटीआई), स्पिनिंग मिल, मोदी कारपेट और उर्वरक बनाने वाला कारखाना इन्कैन शामिल है। लोग मानते हैं कि सोनिया ने आईटीआई के पुनरुद्धार को पैकेज दिलाया। पर, शिकायत यह है कि वे सोचतीं तो दस साल की सरकार में आईटीआई नई रूप में सामने आ सकती है।
कर्मचारियों को पांच महीने से वेतन के लिए तरसना न पड़ता। लोग यह भी मानते हैं कि सोनिया ने फिरोज गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग ऐंड टेक्नालॉजी स्थापित कराकर यहां के लोगों को तकनीकी शिक्षा ग्रहण करने का साधन मुहैया कराया।
राजीव गांधी पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट, नेशनल फैशन डिजाइन का इंस्टीट्यूट, फुटवियर डिजाइन इंस्टीट्यूट स्थापित कराकर रायबरेली को पहचान दिलाई। पर, शिकायत यह कि ये संस्थान रायबरेली में होते हुए भी यहां के लोगों का फायदा देने में नामकामयाब रहे हैं।
काम हुए लेकिन लाभ नहीं
लोग रेल कोच कारखाने को रायबरेली की उपलब्धि मानते हैं लेकिन सवाल उठाते हैं कि इससे भी यहां के लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार तो मिला नहीं, जैसा कि इंदिरा के द्वारा स्थापित कराई गई आईटीआई या अन्य संस्थाओं में मिला था। एम्स को भी लोग रायबरेली की उपलब्धि मानते हैं।
पर, इनकी शिकायत यह है कि इसका काम इतनी सुस्त रफ्तार से चला कि केंद्र की सरकार चली गई लेकिन इसका काम पूरा नहीं हो पाया। ओपीडी शुरू होकर बंद हो गई। सिलौला गांव के सूर्यकुमार वाजपेयी को डर है कि केंद्र में अब दूसरी सरकार है। पता नहीं एम्स का काम पूरा भी होगा या नहीं। महिला विश्वविद्यालय फाइलों में ही रह गया।
नेशनल ड्राइविंग इंस्टीट्यूट और क्षेत्र में बड़े पैमाने पर मेंथा की खेती कर रहे किसानों को रोजगार मुहैया कराने वाले मिंट पार्क की स्थापना का काम इतनी देरी से और सुस्त रफ्तार से शुरू किया गया कि अब इनका पूरा होना अब मुश्किल ही लग रहा है।
रायबरेली की महिलाओं को रोजगार मुहैया कराने के नजरिये से सोनिया गांधी द्वारा स्थापित कराया गया ‘सीना होम टेस्सटाइल कारखाना’ भी चल नहीं पाया। इससे 900 महिलाएं बेरोजगार हो गई।
गांवों की है अपनी पीड़ाएं
बड़ी-बड़ी बातों को छोड़ भी दें तो गांव में छोटे-छोटे काम न होने की नाराजगी भी है। ददुआ के पुरवा के प्राथमिक विद्यालय तक बच्चों के जाने का रास्ता तक ठीक नहीं है। भवन भी जर्जर है।
नतीजतन गीता व नंदू जैसे वही बच्चे इस स्कूल में आते हैं, जिनके मां-बाप के पास दूसरी जगह पढ़ाने को पैसा नहीं है। यही वजह है कि विद्यालय में बच्चों की वास्तविक मौजूदगी कभी 10-12 से ऊपर नहीं बढ़ पाती।
सरेनी क्षेत्र के चहोतर गांव के लोगों को इलाज के लिए पांच-छह किमी. दूर जाना पड़ता है। रात में कोई बीमार हो जाए तो भगवान ही मालिक।
समाजसेवी चंद्रिका प्रसाद मिश्र बताते हैं कि लड़कियों को इंटर कराने के लिए 13-14 किमी दूर जाना पड़ता है। बरसात में तो गांव का हाल टापू जैसा हो जाता है। चहोतर जैसे कई गांव रायबरेली में मौजूद हैं।
इंदिरा के परिवार से लगाव अब भी है
हालांकि इस सवाल पर कि चुनाव में क्या होगा, यहां के लोग चुप हो जाते हैं। जिससे लगता है कि लोगों के दिलों में इंदिरा के परिवार से लगाव अभी हाल-फिलहाल निकलने वाला नहीं है।
सई नदी के किनारे के गांव आशा राम पुरवा के इंद्रभान यादव हों या सुल्तानपुर खेड़ा गांव में मिट्टी के बरतन बनाकर घर की रोटी चलाने वाले गंगाराम।
कहते हैं, ‘एक-दुई नाहीं, कइयों मुसीबतें हैं। हैंडपंप सूखि गै हैं। नहरन में पानी न होय से खेती-पाती संकट में हय। हमरे इलाके में तो आवे-जाए केर भी कउनव साधन नाही हय। पर, का किया जाए। जीकी पूंछ उठाए कय देखव तो सब एकै जस हय।’ इंद्रपाल जोड़ते हैं, ‘सोनिया के कारण भाजपा केर सरकार हमरे इलाके में कुछ करावै से रही।
सोनिया दस साल सरकार में रहीं, कुछ कराइन नाहीं। परदेश (प्रदेश) की सरकार की बात का बताई।’ पर, सुल्तानपुर से थोड़ी दूर आगे खेत में काम करते हुए शत्रोहन भविष्य के बड़े सवाल को सामने रख देते हैं, ‘हम मानित है कि इहां कांग्रेस केर सरकार नहीं रहै।
पर, सपा होय या बसपा, दूनौ पार्टिन का कांग्रेस कइहां समर्थन तो रहिबै करे। कांग्रेसौ इहां इनकी सरकार केरि समर्थन करत रहे? चहतीं तो कइयो काम हुई जातीं। इंदिरा केरे नाम पर कब तक राजनीति में फायदा उठइहैं।’